नारदजी को ध्यान के समय अप्सराओं ने व्यामोह में भले ही न डाला हो, पर वे उन्हें भूल नहीं पाए हैं और वे सारे दृश्य उनके मन में ज्यों के त्यों विद्यमान हैं । राम का उन्होंने इतनी देर जो ध्यान किया, वह तो उन्हें बिसर गया, पर काम का ध्यान बना रहा। इस प्रकार नारद रस लेकर काम की, अप्सराओं की, उनके श्रृंगार की और उन पर विजय पाने की पूरी गाथा शंकरजी को सुना देते हैं । अधिकांशतः बहुत से वक्ता अपनी बात सुनाने के बाद अन्त में पास वालों से पूछते हैं - क्यों कैसा रहा ? जमा कि नहीं ? यह भी कान की भूख है कि कोई कहे कि बहुत अच्छा हुआ । नारदजी भी भूख से प्रेरित होकर शंकरजी की ओर देखते हैं, मानो पूछना चाहते हैं कि कथा अच्छी लगी या नहीं ? यह देखकर शंकरजी के मन में बड़ी दया हो आई कि नारद रोगी हो गए । यदि कोई अज्ञानी व्यक्ति अहंकारी हो जाए, तब तो उसको बताया भी जाय कि अहंकार का त्याग करो । परंतु जो व्यक्ति जानता है कि अहंकार जीवन में सबसे बुरी वस्तु है, अतः कभी अहंकार नहीं करना चाहिए, वही यदि आज अभिमान करके, भगवान को भुलाकर अपना चरित्र सुनावे, तो दया का ही पात्र हो सकता है ।
Saturday, 30 April 2016
Friday, 29 April 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
नारद प्रशंसा सुनने की वृत्ति लेकर कैलाश पर्वत पहुंचे । दो महान भक्तों का मिलन हुआ । एक ओर थे देवर्षि नारद और दूसरी ओर थे भगवान शंकर । दोनों ही महान तत्त्वज्ञ और भगवान के परम भक्त थे । यदि उनमें रामकथा छिड़ जाती तो आनन्द बरस पड़ता । लेकिन आज नारद भगवान का चरित्र सुनाने की मुद्रा में नहीं थे । उन्होंने शंकरजी से कहा कि आज तक तो आपको मैं पुरानी कथा सुनाता आ रहा हूँ, पर आज एक नई कथा सुनाने जा रहा हूँ । नारद का संकेत यह है कि भगवान का चरित्र तो वही पुराना है, पर इस बार वे अपना चरित्र सुनाने जा रहे हैं, जिसमें नवीनता है । उन्होंने शंकरजी को सारी घटना सुनाई कि कैसे काम ने उन पर आक्रमण किया और कैसे अप्सराएँ उनके सामने नृत्य करने लगी । इस वर्णन का एक सांकेतिक तात्पर्य है । वह यह कि जब नारद वर्णन करने लगे, तब उनके मानस-नेत्रों के सामने वे दृश्य फिर से आकर खड़े हो गए । इसका अभिप्राय यह है कि बाहर से अप्सरारूप विषयों का त्याग कर देने पर भी अन्तःकरण में संस्कार के रूप में उनका सौंदर्य, उनका नृत्य, उनका आकर्षण बना हुआ है ।
Thursday, 28 April 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
नारद ने अहंकार की घास को काटने की, मिटाने की चेष्टा नहीं की, अपितु शंकरजी के पास चले गए । वैसे तो भोजन से पेट भर जाता है, पर आपको ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिलेगा, जो प्रशंसा के भोजन से अघा गया हो, जो कहता हो कि अब मुझे प्रशंसा नहीं चाहिए । होता यह है कि व्यक्ति को जितनी प्रशंसा मिलती है, उसकी प्रशंसा की भूख उतनी ही बढ़ती जाती है । तो, नारद की प्रशंसा की भूख इतनी बढ़ गई कि वे सोचने लगे - काम ने तो प्रशंसा कर ही दी है, अब जरा कामारि से भी अपनी प्रशंसा सुन लें ।
Wednesday, 27 April 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
नारद ने यदि भरतजी की तरह ही किया होता और काम की प्रशंसा सुनकर यदि गदगद होकर सोचते कि भगवान कितने कृपामय हैं जो दुर्गुणों से मुझे बचा लिया और काम-क्रोध-लोभ से मुझे सुरक्षित रखा, तो प्रशंसा भगवान को अर्पित हो जाती और नारद अहंकार से न बँध पाते । पर नारद बहुत दिनों से भूखे थे ! जैसे सभी इन्द्रियों की अपनी भूख होती है, वैसे ही कान की भी तो भूख होती है, तो नारद को बहुत दिनों से कान से प्रशंसा के शब्द सुनने को नहीं मिले थे, इसलिए जब प्रशंसा का भोजन आया तो उन्होंने पूरा आनन्द लेते हुए भोजन किया । वे फिर विष्णु भगवान के पास भी पहुँच गये और जब वे भी प्रशंसा करने लगे, तब नारदजी ने सोचा कि अब तो भोग लगा ही देना चाहिए । वे भगवान से कहते हैं -
नारद कहेउ सहित अभिमाना ।
कृपा तुम्हारि सकल भगवाना ।।
अब यदि यह बात पहले ही नारदजी की समझ में आ जाती, तो वे सारे दुर्गुणों से ही मुक्त हो जाते । पर दुर्भाग्य यह है कि उनके मन में भगवान की स्मृति नहीं आई, उन्हें केवल अपनी श्रेष्ठता का स्मरण आया । इस प्रकार एक ओर जहाँ उन्होंने अपने अन्तःकरण में सत्कर्म का, साधना का इतना पवित्र धान्य उपजाया, वहीं अहंकार के बीज भी अंकुरित हो गए ।
नारद कहेउ सहित अभिमाना ।
कृपा तुम्हारि सकल भगवाना ।।
अब यदि यह बात पहले ही नारदजी की समझ में आ जाती, तो वे सारे दुर्गुणों से ही मुक्त हो जाते । पर दुर्भाग्य यह है कि उनके मन में भगवान की स्मृति नहीं आई, उन्हें केवल अपनी श्रेष्ठता का स्मरण आया । इस प्रकार एक ओर जहाँ उन्होंने अपने अन्तःकरण में सत्कर्म का, साधना का इतना पवित्र धान्य उपजाया, वहीं अहंकार के बीज भी अंकुरित हो गए ।
Tuesday, 26 April 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
.....कल से आगे .....
भगवान ने पूछा, "अच्छा, दोष देखना यदि मुझे नहीं आता तो गुण देखना तो आता है ?" भरतजी बोले, महाराज, गुण देखना आपको आता तो है, पर मैं आपसे पूछता हूँ यदि तोता बहुत बढ़िया श्लोक पढ़ने लगे और बन्दर बहुत बढ़िया नाचने लगे तो यह बन्दर या तोते की विशेषता है अथवा पढ़ाने और नचानेवाले की ? भगवान ने कहा, पढ़ाने और नचानेवाले की । भरतजी बोले, महाराज, बिल्कुल ठीक कहा आपने । मैं तो तोते और बन्दर की तरह हूँ । यदि मुझमें कोई विशेषता दिखाई देती है तो पढ़ाने और नचानेवाले तो आप ही हैं । इसलिए यह प्रशंसा आपको ही अर्पित है । भगवान ने भरत से कहा, भरत, तो प्रशंसा तुमने लौटा दी । भरतजी बोले, प्रभु, प्रशंसा का कुपथ्य सबमें अजीर्ण पैदा कर देता है, सबको डमरुआ रोग से ग्रसित कर देता है । लेकिन आप इस प्रशंसा को पचाने में बड़े निपुण हैं । अनादिकाल से सारे भक्त आपकी स्तुति कर रहे हैं, पर आपको तो कभी अहंकार हुआ नहीं, ऐसी स्थिति में यह प्रशंसा आपको ही निवेदित है ।
भगवान ने पूछा, "अच्छा, दोष देखना यदि मुझे नहीं आता तो गुण देखना तो आता है ?" भरतजी बोले, महाराज, गुण देखना आपको आता तो है, पर मैं आपसे पूछता हूँ यदि तोता बहुत बढ़िया श्लोक पढ़ने लगे और बन्दर बहुत बढ़िया नाचने लगे तो यह बन्दर या तोते की विशेषता है अथवा पढ़ाने और नचानेवाले की ? भगवान ने कहा, पढ़ाने और नचानेवाले की । भरतजी बोले, महाराज, बिल्कुल ठीक कहा आपने । मैं तो तोते और बन्दर की तरह हूँ । यदि मुझमें कोई विशेषता दिखाई देती है तो पढ़ाने और नचानेवाले तो आप ही हैं । इसलिए यह प्रशंसा आपको ही अर्पित है । भगवान ने भरत से कहा, भरत, तो प्रशंसा तुमने लौटा दी । भरतजी बोले, प्रभु, प्रशंसा का कुपथ्य सबमें अजीर्ण पैदा कर देता है, सबको डमरुआ रोग से ग्रसित कर देता है । लेकिन आप इस प्रशंसा को पचाने में बड़े निपुण हैं । अनादिकाल से सारे भक्त आपकी स्तुति कर रहे हैं, पर आपको तो कभी अहंकार हुआ नहीं, ऐसी स्थिति में यह प्रशंसा आपको ही निवेदित है ।
Monday, 25 April 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
रामायण में जो चतुर पात्र हैं, उनको यदि प्रशंसा परोसी जाए, तो वे तुरंत भगवान को परोस देते हैं । चित्रकुट में भगवान ने भरतजी के सामने प्रशंसा की लम्बी थाल परोस दी । लेकिन भरतजी ने भगवान को उसका भोग लगा दिया । भगवान ने पूछा, 'भरत, यह बताओ मैं जो कह रहा हूँ, वह ठीक है या नहीं ? मेरी दृष्टि पर तुम्हें विश्वास है या नहीं ?' भरतजी बोले, 'प्रभु, मैं आपकी दृष्टि पर विश्वास कैसे न करूँ ? जब आप कह रहे हैं, अवश्य होगा ।' भगवान बोले, 'अब तो अपनी निन्दा नहीं करोगे ? अपने को पापी नहीं कहोगे ?' भरतजी ने कहा, नहीं महाराज, मैं जानता हूँ, आपके सामने एक समस्या है, यह कि दोष तो आप देख ही नहीं पाते । इसलिए मेरे दोष आपको दिखाई नहीं देते हैं तो ठीक ही है । भगवान ने पूछा, अच्छा, दोष देखना यदि मुझे नहीं आता तो गुण देखना तो आता है ?
.....आगे कल ......
.....आगे कल ......
Sunday, 24 April 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
हम लोगों के यहाँ यह माना जाता है कि जो जैसा भोजन करता है, उसका मन वैसा बन जाता है, इसलिए भोजन को शुध्द होना चाहिए । अब भोजन की शुध्दि के लिए अनेक पध्दतियों का वर्णन किया गया है, लेकिन कितनी भी चेष्टा की जाए, व्यक्ति यह कैसे दावा कर सकता है कि वह जो कुछ खा रहा है, वह शुध्द ही है ? ऐसी स्थिति में हमारे यहाँ के भक्तों ने जिस मार्ग का मार्ग का अनुगमन किया, वह बड़ा कल्याणकारी है । भक्त को जब अन्न दिया जाता है, तब वह पहले भगवान को भोग लगाता है और तत्पश्चात दूसरों को प्रसाद बाँटकर स्वयं खाता है । तो, सामान्य भोजन को तो बहुत से लोग भोग लगाकर ग्रहण करते हैं, पर प्रशंसा के भोजन का भोग लगाना भूल जाते हैंं । प्रशंसा का व्यंजन ऐसा होता है, जो व्यक्ति के जीवन में अहंकार की सृष्टि करता है । हम जब भी अपनी प्रशंसा सुनेंगे, अहंकार होने का भय बना ही रहेगा । ऐसा हो नहीं सकता कि कोई हमारी प्रशंसा करे ही न । किसी को प्रशंसा करने से रोका नहीं जा सकता । ऐसी स्थिति में उपाय क्या है ? - यही कि उस प्रशंसा को भगवान को समर्पित कर दिया जाय और उसे बाँट दिया जाए । जब भी कानों में प्रशंसा आवे, उसे तुरन्त भगवान को निवेदित कर दें । नारद ने भी ऐसा किया, लेकिन बहुत देर बाद । नियम यह है कि पहले भोग लगा लें, तब भोजन करें । पर नारदजी पहले भोजन कर लेते हैं और बाद में जब थोड़ी सी जूठन बच रहती है, तब भगवान को भोग लगाते हैं । वे क्रम को उलट देते हैं ।
Saturday, 23 April 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........
....कल से आगे ......
रोग तब होता है, जब रोगी कुपथ्य करता है । नारद ने सारी इन्द्रियों से तो कुपथ्य रोक दिया, पर एक इन्द्रिय से कुपथ्य हो गया । अप्सराओं का सौन्दर्य सामने आया, तो नेत्र से रंचमात्र कुपथ्य नहीं किया, उस पर दृष्टि तक न डाली । वहाँ पर अप्सराओं ने दिव्य सुगंध की सृष्टि की, तो नासिका के द्वारा भी उन्होंने कुपथ्य नहीं किया । जिह्वा के माध्यम से भी नारद किसी वस्तु का कुपथ्य करने वाले थे नहीं । स्पर्श-सुख को त्यागकर त्वचा का भी उन्होंने कुपथ्य नहीं किया । पर एक कुपथ्य से वे बच नहीं पाए । वैसे उससे बच पाना है भी कठिन । वह कुपथ्य श्रवणेन्द्रिय का था । आँख, नाक और जिह्वा से कुपथ्य रोकना सरल है, पर कान का कुपथ्य ऐसा प्रिय लगता है कि बड़े-बड़े त्यागी पुरूष भी इस कुपथ्य से बच नहीं पाते । यह कान का कुपथ्य क्या था ? जब काम जाने लगा तो जाते-जाते एक बात नारदजी के कान में कहता गया और नारदजी ने बड़े प्रेम से उसे भीतर ले लिया । काम कहता गया - महाराज ! विश्व के इतिहास में आपसे बढ़कर कोई महापुरूष हुआ ही नहीं ! बस, त्योहीं प्रशंसा का कुपथ्य नारद के कान में पैठ गया और उनके अन्तःकरण में घास अंकुरित हो गई । चाहे उसे अहंकार की घास कह दीजिए, चाहे मोह की ।
रोग तब होता है, जब रोगी कुपथ्य करता है । नारद ने सारी इन्द्रियों से तो कुपथ्य रोक दिया, पर एक इन्द्रिय से कुपथ्य हो गया । अप्सराओं का सौन्दर्य सामने आया, तो नेत्र से रंचमात्र कुपथ्य नहीं किया, उस पर दृष्टि तक न डाली । वहाँ पर अप्सराओं ने दिव्य सुगंध की सृष्टि की, तो नासिका के द्वारा भी उन्होंने कुपथ्य नहीं किया । जिह्वा के माध्यम से भी नारद किसी वस्तु का कुपथ्य करने वाले थे नहीं । स्पर्श-सुख को त्यागकर त्वचा का भी उन्होंने कुपथ्य नहीं किया । पर एक कुपथ्य से वे बच नहीं पाए । वैसे उससे बच पाना है भी कठिन । वह कुपथ्य श्रवणेन्द्रिय का था । आँख, नाक और जिह्वा से कुपथ्य रोकना सरल है, पर कान का कुपथ्य ऐसा प्रिय लगता है कि बड़े-बड़े त्यागी पुरूष भी इस कुपथ्य से बच नहीं पाते । यह कान का कुपथ्य क्या था ? जब काम जाने लगा तो जाते-जाते एक बात नारदजी के कान में कहता गया और नारदजी ने बड़े प्रेम से उसे भीतर ले लिया । काम कहता गया - महाराज ! विश्व के इतिहास में आपसे बढ़कर कोई महापुरूष हुआ ही नहीं ! बस, त्योहीं प्रशंसा का कुपथ्य नारद के कान में पैठ गया और उनके अन्तःकरण में घास अंकुरित हो गई । चाहे उसे अहंकार की घास कह दीजिए, चाहे मोह की ।
Friday, 22 April 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
काम अप्सराओं को लेकर नारद के पास आता है, पर नारदजी के मन पर अप्सराओं के मोहक हाव-भाव, नृत्य आदि का रंचमात्र प्रभाव नहीं पड़ता । वे शान्त भाव से बैठे रहते हैं । यह देख काम के मन में भय उत्पन्न होता है कि कहीं मुनि क्रोध करके मुझे भस्म न कर दें । नारद शान्त भाव से काम को देखते हैं । काम डर के मारे उनके चरणों में आ गिरता है और कहता है - महाराज, मैंने जो कुछ किया है, वह इन्द्र के कहने पर किया है । काम के कथन का अर्थ यही है कि यदि दण्ड देना हो तो इन्द्र को दीजियेगा, मुझे नहीं । यही व्यक्ति के जीवन की विडंबना है । अभी तक तो काम इन्द्र का सहयोगी बना हुआ था, और अब जब अपने उद्यम में असफल हो गया, तब कहता है कि मैंने यहीं अपनी इच्छा से नहीं किया है ! फिर भी नारद को क्रोध नहीं आया और उन्होंने मुस्कुराकर काम से कहा- तुम इन्द्र से जाकर कह देना कि मेरे अन्तःकरण में स्वर्ग का कोई लोभ नहीं है, वह आनन्द से स्वर्ग के भोगों को भोगे, राज्य करे । काम नारद के चरणों में प्रणाम करके चला गया । लेकिन एक विचित्र बात हो गयी । अभी नारद के जीवन में सद् विचारों की, सत्कर्मों की, साधना की इतनी बढ़िया खेती हुई थी, पर अब उसकी बगल में घास उग आई और नारद उस घास को अनदेखा कर देते हैं, घास की पहचान नहीं कर पाते हैं । यही नारद की समस्या है ।
......क्रमशः ......
......क्रमशः ......
Thursday, 21 April 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
तुलसीदासजी से किसी ने पूछ दिया कि स्वर्ग में जाकर मनुष्य तो दुर्गुणों से मुक्त हो जाता होगा ? उत्तर में गोस्वामीजी ने व्यंग्य करते हुए कहा - और दुर्गुण चाहे कम हो जाएँ, पर वहाँ जाकर एक दुर्गुण बढ़ जाता है और वह है ईर्ष्या । वे विनयपत्रिका में लिखते हैं - 'स्वर्गहु मिटइ न सावत' - स्वर्ग में सौतियाडाह नहीं मिटती, ईर्ष्या नहीं मिटती । अब नारद हैं त्यागी और इन्द्र हैंं भोगी । और विचित्रता यह है कि त्याग और भोग दोनों ही पुण्य के फल हैं । पुण्य से व्यक्ति को भोग भी प्राप्त हो सकता है और वैराग्य भी । चुनाव तो व्यक्ति को करना है । देवर्षि नारद तो पुण्य के द्वारा वैराग्य पाने के पक्ष में हैं, पर इन्द्र के मन में भय उत्पन्न होता है कि कहीं ये मेरे स्वर्ग पर अधिकार प्राप्त करने के लिए ही तो तपस्या नहीं कर रहे हैं । इन्द्र अपने माप-दण्ड से नारदजी को नापता है । उसे लगता है कि हमने इतना सत्कर्म करके स्वर्ग प्राप्त किया, नारद भी निश्चय ही स्वर्ग पाने के लिए ही तपस्या कर रहे होंगे । और तब यहाँ पर दुर्गुण के साथ देवता का एक अनोखा समझौता हो जाता है । इन्द्र काम को बुलाकर कहता है - तुम अपने सहायकों सहित जाओ और नारद को ध्यान से विरत करने की चेष्टा करो ।
Wednesday, 20 April 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
नारद ने देश, काल और व्यक्तित्व, इन तीनों से मुक्ति प्राप्त कर ली । फलस्वरूप दक्ष प्रजापति ने उन्हे जो शाप दिया था, उसका कोई अर्थ नहीं रहा, क्योंकि वे न तो किसी स्थान में बैठे थे, न किसी काल में थे और न व्यक्तित्व की ही सीमा में थे । वे पूरी तरह दिव्य मनःस्थिति में थे । लेकिन स्वर्ग में बैठे हुए इन्द्र के मन में भय पैदा हो गया कि नारद कहीं स्वर्ग पर अधिकार करने के लिए तो तपस्या नहीं कर रहे हैं । और वह ऐसा सोच उनकी तपस्या भंग करने की चेष्टा में लग जाता है । यहाँ पर गोस्वामीजी एक बड़े महत्व की मनोवैज्ञानिक बात बताते हैं । वैसे लगता तो यही है कि दुर्गुणों की ओर से व्यक्ति के जीवन में बाधा आती है, लेकिन कभी-कभी ऐसा भी दिखाई देता है कि दुर्गुण और सद्गुण मिलकर साधक के जीवन में बाधा की सृष्टि कर रहे हैं । नारद के जीवन में इसी दूसरे तथ्य की ओर संकेत किया गया है । नारद की तपस्या को भंग करने की वृत्ति किसी राक्षस या दैत्य के मन में नहीं आती, वह आती है इन्द्र के मन में । और इन्द्र कौन है ? सबसे बड़ा पुण्यात्मा । सौ अश्वमेध यज्ञ करने वाला ही इन्द्र का पद प्राप्त करता है । तो, ऐसा इन्द्र जो स्वयं सत्कर्म करने वाला है, जब दूसरे को सत्कर्म से विरत करने की चेष्टा करता है, तब यह बात बड़ी अटपटी-सी मालूम पड़ती है । पर यही समाज का सत्य है और जीवन का भी । अच्छे काम में बाधा केवल बुरे लोग ही नहीं डालते, कभी-कभी अच्छे लोग भी डालते हैं । यह तब होता है, जब उनके मन में ईर्ष्या उत्पन्न होती है कि कहीं वह मुझसे बढ़िया काम न कर दे । अच्छा कहलाने वाले ऐसे ईर्ष्यालु व्यक्ति भोगपरायण होते हैं । वे सत्कर्म के बदले कुछ पाना चाहते हैं । उनके मन में यही चिंता रहती है कि बँटवारे में सब मुझे ही मिले, दूसरों को कुछ न मिल पाए ।
Tuesday, 19 April 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
......कल से आगे ......
नारदजी के अन्तःकरण में अन्तर्मुखता की वृत्ति आ गयी और वे बैठकर ध्यान में लीन हो गए । फलस्वरूप प्रजापति का शाप व्यर्थ चला गया, क्योंकि शाप तो तब कार्य करता, जब नारद देश और काल की सीमा में होते । वे तो ध्यान में बैठकर देश-काल और व्यक्तित्व की सीमा से ऊपर उठ गये थे । इसका अर्थ यह है कि यदि ध्यान में बैठने पर भी यह याद बनी रहे कि मैं कहाँ बैठा हूँ, कितना समय हुआ है, मैं कौन हूँ, तो समझ लेना चाहिए कि ध्यान बिल्कुल अधूरा है । उदाहरणार्थ, जब यह कहते हैं कि ध्यान कीजिए कि अयोध्या नगर में सरयू बह रही है, सरयूजी के किनारे एक कल्पतरू है, कल्पतरू के नीचे एक सिंहासन है और उस सिंहासन पर भगवान राम और सीताजी बैठे हुए हैं, तब यदि व्यक्ति देश के प्रति सजग होगा, तो उसे लगेगा कि नहीं, मैं तो इस शहर में ही बैठा हुआ हूँ । वह अयोध्या या वृन्दावन या उस देश की भावना नहीं कर पायेगा, जहाँ का वह ध्यान करना चाहता है । फलस्वरूप उसमें तन्मयता नहीं आ पाएगी । इसी प्रकार जब काल का चिन्तन करेगा, तब भी उसे दूरी की अनुभूति होगी । उसे लगेगा कि भगवान का अवतार तो कितना पहले हुआ था, अतः हमारे और उनके काल में बड़ी दूरी है । अब राम भला कहाँ हैं, कृष्ण कहाँ हैं ! इसका परिणाम यह होगा कि उसको सच्चा ध्यान नहीं लग पायेगा । इसी प्रकार सच्चे ध्यान के लिए व्यक्तित्व की सीमा को भी लाँघना पड़ता है । जैसे भगवान का ध्यान करता हुआ व्यक्ति अपने आपको कुछ न कुछ करता हुआ पाता है । भक्त ध्यान करता हुआ देखता है कि वह माला गूँथकर भगवान को पहना रहा है । अब वह अपने आपको जिस शरीर से माला पहनाता हुआ देखता है, वह स्थूल शरीर तो है नहीं, वह तो उसका भावनात्मक शरीर है । ऐसी स्थिति में अगर उसका स्थूल शरीर ही उसके चिन्तन में आता रहा, तो वह सच्ची तन्मयता प्राप्त नहीं कर सकेगा ।
नारदजी के अन्तःकरण में अन्तर्मुखता की वृत्ति आ गयी और वे बैठकर ध्यान में लीन हो गए । फलस्वरूप प्रजापति का शाप व्यर्थ चला गया, क्योंकि शाप तो तब कार्य करता, जब नारद देश और काल की सीमा में होते । वे तो ध्यान में बैठकर देश-काल और व्यक्तित्व की सीमा से ऊपर उठ गये थे । इसका अर्थ यह है कि यदि ध्यान में बैठने पर भी यह याद बनी रहे कि मैं कहाँ बैठा हूँ, कितना समय हुआ है, मैं कौन हूँ, तो समझ लेना चाहिए कि ध्यान बिल्कुल अधूरा है । उदाहरणार्थ, जब यह कहते हैं कि ध्यान कीजिए कि अयोध्या नगर में सरयू बह रही है, सरयूजी के किनारे एक कल्पतरू है, कल्पतरू के नीचे एक सिंहासन है और उस सिंहासन पर भगवान राम और सीताजी बैठे हुए हैं, तब यदि व्यक्ति देश के प्रति सजग होगा, तो उसे लगेगा कि नहीं, मैं तो इस शहर में ही बैठा हुआ हूँ । वह अयोध्या या वृन्दावन या उस देश की भावना नहीं कर पायेगा, जहाँ का वह ध्यान करना चाहता है । फलस्वरूप उसमें तन्मयता नहीं आ पाएगी । इसी प्रकार जब काल का चिन्तन करेगा, तब भी उसे दूरी की अनुभूति होगी । उसे लगेगा कि भगवान का अवतार तो कितना पहले हुआ था, अतः हमारे और उनके काल में बड़ी दूरी है । अब राम भला कहाँ हैं, कृष्ण कहाँ हैं ! इसका परिणाम यह होगा कि उसको सच्चा ध्यान नहीं लग पायेगा । इसी प्रकार सच्चे ध्यान के लिए व्यक्तित्व की सीमा को भी लाँघना पड़ता है । जैसे भगवान का ध्यान करता हुआ व्यक्ति अपने आपको कुछ न कुछ करता हुआ पाता है । भक्त ध्यान करता हुआ देखता है कि वह माला गूँथकर भगवान को पहना रहा है । अब वह अपने आपको जिस शरीर से माला पहनाता हुआ देखता है, वह स्थूल शरीर तो है नहीं, वह तो उसका भावनात्मक शरीर है । ऐसी स्थिति में अगर उसका स्थूल शरीर ही उसके चिन्तन में आता रहा, तो वह सच्ची तन्मयता प्राप्त नहीं कर सकेगा ।
Monday, 18 April 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
......कल से आगे .....
आप जानते होंगे कि नारद को दक्ष प्रजापति ने शाप दिया था कि तुम दो घड़ी से अधिक कहीं नहीं ठहर पाओगे । ब्रह्मा ने दक्ष को सृष्टि का विस्तार करने की आज्ञा दी थी । दक्ष के पुत्र जब कुछ बड़े होते, तब नारद वहाँ पहुँच जाते और उनको ऐसा सत्संग प्रदान करते कि वे लोग घर-बार छोड़कर वन में चले जाते थे । दक्ष ने जब देखा कि यह तो बार-बार मेरी चेष्टा विफल कर रहा है, तब एक दिन बिगड़कर नारद से कहा - तुम लड़कों को बिगाड़ते हो, इसलिए तुम्हारा कहीं पर बहुत देर तक रहना बड़ा घातक है, अतएव मैं तुमको शाप देता हूँ कि तुम अधिक देर तक कहीं नहीं ठहर पाओगे । पर इस शाप से नारद की कोई हानि नहीं हुई, बल्कि लाभ ही हुआ; क्योंकि घूमते रहने से अधिकाधिक लोगों की समस्याओं से उनका परिचय होता गया और वे उनके दुखों को दूर करने में प्रयत्नशील होते रहे । पर आज उनके अन्तःकरण में अन्तर्मुखता की वृत्ति आ गयी और वे बैठकर ध्यान में लीन होता गए ।
......क्रमशः ......
आप जानते होंगे कि नारद को दक्ष प्रजापति ने शाप दिया था कि तुम दो घड़ी से अधिक कहीं नहीं ठहर पाओगे । ब्रह्मा ने दक्ष को सृष्टि का विस्तार करने की आज्ञा दी थी । दक्ष के पुत्र जब कुछ बड़े होते, तब नारद वहाँ पहुँच जाते और उनको ऐसा सत्संग प्रदान करते कि वे लोग घर-बार छोड़कर वन में चले जाते थे । दक्ष ने जब देखा कि यह तो बार-बार मेरी चेष्टा विफल कर रहा है, तब एक दिन बिगड़कर नारद से कहा - तुम लड़कों को बिगाड़ते हो, इसलिए तुम्हारा कहीं पर बहुत देर तक रहना बड़ा घातक है, अतएव मैं तुमको शाप देता हूँ कि तुम अधिक देर तक कहीं नहीं ठहर पाओगे । पर इस शाप से नारद की कोई हानि नहीं हुई, बल्कि लाभ ही हुआ; क्योंकि घूमते रहने से अधिकाधिक लोगों की समस्याओं से उनका परिचय होता गया और वे उनके दुखों को दूर करने में प्रयत्नशील होते रहे । पर आज उनके अन्तःकरण में अन्तर्मुखता की वृत्ति आ गयी और वे बैठकर ध्यान में लीन होता गए ।
......क्रमशः ......
Sunday, 17 April 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........
नारदजी के चरित्र में हम देखते हैं कि बीज तो उन्होंने बहुत बढ़िया डाला और खेती हरी-भरी हो गई । पर उन्होंने जो नहीं उपजाना चाहा था, वह भी उपज आया । किन्तु वे उसे काटने की चेष्टा नहीं करते । तब भगवान सोचते हैं कि ये तो इतने निष्क्रिय हो गये हैं कि मुझे ही कटाई - निराई करनी पड़ेगी, भले ही इनको कष्ट हो । यही नारदजी के चरित्र की विडंबना है । पुराणों में उनके अगणित जन्मों का प्रसंग आता है । उन्होंने जीवन को अनेक रूपों में अनुभव किया है और वे अनुभव उनके अर्न्तमन में कहीं न कहीं संस्कार रूप में विद्यमान हैं । हम 'मानस' में पढ़ते हैं कि नारद हिमालय की उपत्यका में जाते हैं और जब वहाँ का वातावरण देखते हैं कि झरना झर रहा है, बड़ी सुन्दर सुशीतल वायु बह रही है, चारों तरफ हरियाली है, तो उन्हें लगता है कि वह भगवान का ध्यान करने के लिए अनुकूल है । वे वहाँ की एक गुफा में बैठकर ध्यान में तल्लीन हो जाते हैं ।
.......क्रमशः ..... ..
.......क्रमशः ..... ..
Saturday, 16 April 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
....कल से आगे ......
अब किसी खेत में घास बहुत अधिक मात्रा में उपज जाय तो वह खाद और जल का अपनी बढ़त के लिए उपयोग कर धान की जीवनी शक्ति का ही शोषण कर लेगी । परिणाम यह होगा कि या तो धान उपजेगा ही नहीं या फिर नाम मात्र को उपजेगा, उसकी सारी शक्ति घास को मिल जाएगी । आलसी और निष्क्रिय किसान सोचता है कि कौन इतना श्रम करे, पर चतुर किसान घास को निकालने के लिए डट जाता है । वह अपने इस काम के लिए कोई फावड़ा या बड़ा अस्त्र नहीं लेता । वह तो नन्ही-सी खुरपी लेकर एक-एक पौधे के आस-पास बड़े ध्यान से देखता हुआ घास और धान का भेद करता है तथा घास को काटता चलता है । इसको 'निराना' कहते हैं । भगवान राम कहते हैं कि लक्ष्मण, इसी प्रकार साधक जब अपने जीवन में सत्कर्म की खेती करता है, तब उसकी बगल में पूर्व-पूर्व जन्मों के उसके अन्तःकरण में छिपे हुए संस्कार भी अंकुरित हो जाते हैं । ऐसी परिस्थिति में उसकी सावधानी यह होनी चाहिए कि वह बुरे संस्कारों के पौधों को खुरपी से उसी प्रकार निराते चले, जैसे विद्वान लोग मोह, मद और मान का त्याग कर देते हैं । यह मोह, मद और मान ऐसा है, जिसका बीज इस जन्म में न डालने पर भी वह पूर्व-पूर्व जन्मों के संचित संस्कारों के फलस्वरूप अंकुरित होता रहता है । ऐसी परिस्थिति में सजग रहकर देखना पड़ेगा कि जो धान है, हमारे तो सत्संग के जल से वृद्धिगत हो, पर उसके साथ, उसकी बगल में उगनेवाली घास काट ली जाए ।
अब किसी खेत में घास बहुत अधिक मात्रा में उपज जाय तो वह खाद और जल का अपनी बढ़त के लिए उपयोग कर धान की जीवनी शक्ति का ही शोषण कर लेगी । परिणाम यह होगा कि या तो धान उपजेगा ही नहीं या फिर नाम मात्र को उपजेगा, उसकी सारी शक्ति घास को मिल जाएगी । आलसी और निष्क्रिय किसान सोचता है कि कौन इतना श्रम करे, पर चतुर किसान घास को निकालने के लिए डट जाता है । वह अपने इस काम के लिए कोई फावड़ा या बड़ा अस्त्र नहीं लेता । वह तो नन्ही-सी खुरपी लेकर एक-एक पौधे के आस-पास बड़े ध्यान से देखता हुआ घास और धान का भेद करता है तथा घास को काटता चलता है । इसको 'निराना' कहते हैं । भगवान राम कहते हैं कि लक्ष्मण, इसी प्रकार साधक जब अपने जीवन में सत्कर्म की खेती करता है, तब उसकी बगल में पूर्व-पूर्व जन्मों के उसके अन्तःकरण में छिपे हुए संस्कार भी अंकुरित हो जाते हैं । ऐसी परिस्थिति में उसकी सावधानी यह होनी चाहिए कि वह बुरे संस्कारों के पौधों को खुरपी से उसी प्रकार निराते चले, जैसे विद्वान लोग मोह, मद और मान का त्याग कर देते हैं । यह मोह, मद और मान ऐसा है, जिसका बीज इस जन्म में न डालने पर भी वह पूर्व-पूर्व जन्मों के संचित संस्कारों के फलस्वरूप अंकुरित होता रहता है । ऐसी परिस्थिति में सजग रहकर देखना पड़ेगा कि जो धान है, हमारे तो सत्संग के जल से वृद्धिगत हो, पर उसके साथ, उसकी बगल में उगनेवाली घास काट ली जाए ।
Friday, 15 April 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
गोस्वामीजी विनयपत्रिका में मोह की बड़ी सुन्दर व्याख्या करते हैं - बड़ा यत्न करने पर भी व्यक्ति मोहजनित मल से छूट नहीं पा रहा है । इस पर पूछा गया कि ऐसा क्यों होता है ? जब अभ्यास कर रहा है, तब तो छूट जाना चाहिए ? इसका उत्तर देते हुए वह कहते हैं - जन्म-जन्म के अभ्यास से हमारे अन्तःकरण में जो संस्कार बीज के रूप में पहले से ही विद्यमान हैं, उनसे यह मल अधिकाधिक लिपटता ही चला जाता है । जैसे हम और आप सत्संग में जाते हैं और कुछ अच्छी बातें सुनते हैं, अच्छे विचार के बीज मन में डालते हैं । ये बीज अन्तःकरण में अच्छे संस्कार के रूप में प्रकट होते हैं । लेकिन इनके साथ ही जन्म-जन्मांतरों के बुरे विचारों के बीज भी वहाँ छिपे हुए हैं और वे भी अवसर मिलते ही अनजाने ही प्रकट हो जाते हैं । धान और घास के पौधे देखने में बिल्कुल एक जैसे हरे-भरे दिखाई पड़ते हैं । इसलिए घास निकालने वाले को यह सावधानी रखनी पड़ती है कि कहीं धान का पौधा न उखड़ जाय और यह भी कि धान की आड़ में कोई घास का पौधा छिपा न रह जाए । अब यह तो बड़ा कठिन कार्य है । मानस में जो 'निराना' शब्द आया है, उसका यही अर्थ होता है । भगवान राम लक्ष्मण से कहते हैं कि साधक यदि सावधान न हो, तो उसके अन्तःकरण में सद् विचारों के बीज के साथ-साथ घास-फूस भी अंकुरित होता जाता है ।
......आगे कल .......
......आगे कल .......
Thursday, 14 April 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
मानस में कहा गया है कि काम - क्रोध के मूल में व्यक्ति का मोह विद्यमान है । और मोह ऐसा है, जिसे पैदा करने की कोई चेष्टा नहीं करनी पड़ती । मानस में इसे समझाने के लिए एक सार्थक दृष्टांत दिया गया है । किसान अन्न पैदा करने के लिए खेत को जोतता है, उसमें बीज डालता है और उसकी सिंचाई करता है या आकाश से जल बरसता है । किसान अपनी इस क्रिया के द्वारा खेत से अन्न ही लेना चाहता है, पर उसका प्रतिवर्ष का अनुभव यह बताता है कि वह कितना भी बढ़िया खेत क्यों न जोते और उसमें कितने ही उत्तम बीज क्यों न डाले, अन्न के पौधे उगने के साथ-साथ वहाँ घास के पौधे भी उग आते हैं । अब कोई किसान घास की खेती थोड़े ही करता है ? कोई नहीं चाहता कि मेरे खेत में घास पैदा हो । वह तो धान या गेहूँ ही चाहता है । लेकिन विचित्र बात यह है कि जिस जल के द्वारा वांछित अन्न बढ़ता है, उसी जल के द्वारा उस पृथ्वी में अवांछित घास भी बढ़ती है । अन्न तो किसान ने ऊपर से डाला , फिर घास कहाँ से आ गई ? इसका उत्तर यह है कि घास पहले से ही पृथ्वी में बीज रूप में विद्यमान है । यही स्थिति हमारे-आपके अन्तःकरण की है । कुछ बीज तो ऐसे हैं, जिन्हें हम और आप इस समय अपने अन्तःकरण में डालने की चेष्टा कर रहे हैं । पर कुछ बीज ऐसे हैं, जो पूर्व-पूर्व जन्मों के संस्कार के रूप में विद्यमान हैं ।
Wednesday, 13 April 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........
किसी ने मुझसे कहा - नारद को जब अहंकार हो गया, तो भगवान भाषण दे देते कि अहंकार कितना बुरा है और यह कह देते कि नारद, तुम्हें अहंकार नहीं करना चाहिए । इस पर मैंने कहा - भाई ! जो न जाने, उसके सामने भाषण देने में कुछ सार्थकता है । क्या नारद को नहीं पता कि अहंकार में कितनी बुराई है ? क्या भगवान कहेंगे तभी नारद को यह समझ में आयेगा कि अहंकार कितना बुरा है ? नारद यह सब जानते हैं । इसलिए भगवान ने नारद को समझाने की चेष्टा नहीं की, क्योंकि वे जानते हैं कि शंकरजी द्वारा नारद को समझाकर उनके अर्न्तमन की बुराइयों को दूर करने की चेष्टा की जा चुकी है, पर उससे कोई लाभ नहीं हुआ । भगवान विष्णु ने समझ लिया कि केवल वाणी के द्वारा, प्रवचन के द्वारा, विश्लेषण के द्वारा उनके अर्न्तमन की समस्याओं का समाधान नहीं किया जा सकता ।
Tuesday, 12 April 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ...........
शरीर में जितने रोग होते हैं, उनके मूल में किसी-न-किसी प्रकार का कुपथ्य होता है । अधिकांशतः व्यक्ति यह जानता है कि मुझे यह भोजन नहीं करना चाहिए, इस समय ऐसा करने से मैं रोगग्रस्त हो जाऊँगा । पर जब व्यक्ति उस ज्ञान का अनादर कर उसके प्रतिकूल आचरण करता है, तो अस्वस्थ हो जाता है । तो, जिस वृत्ति के कारण शरीर में रोग उत्पन्न होता है, वह कुपथ्य है तथा कुपथ्य के मूल में जानते हुए भी विपरीत आचरण करने की जो वृत्ति है, उसका नाम है मोह । इसलिए मोह को 'चित्त का विपर्यय' कहा गया है । यही कारण है कि रामायण में मोह को अज्ञान का प्रतीक या पर्यायवाची नहीं माना गया है । अज्ञान का तो अर्थ है न जानना, पर मोह में ज्ञान के होते हुए भी उसका तिरस्करण है । तो, मोह को समझाने के लिए नारदजी का प्रसंग लिया गया, क्योंकि नारदजी से अधिक जानने वाला, उनसे बढ़कर आध्यात्मिक सत्य को समझनेवाला और कौन हो सकता है ?
Monday, 11 April 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........
रामायण का एक प्रसंग तो मोह की बड़ी ही सांकेतिक व्याख्या करता है, और वह है देवर्षि नारद का प्रसंग । वैसे देवर्षि नारद का जो चरित्र है, उसमें अनेक मानस-रोगों का वर्णन किया गया है, यह भी बताया गया है कि देवर्षि नारद के मन में तीव्र काम का उदय हुआ, ऐसा भी वर्णन आता है कि उनमें तीव्र क्रोध का उदय हो गया, फिर यह भी कहा गया कि उनमें काम पर विजय के पश्चात अहंकार उत्पन्न हो गया था । इस प्रकार नारद काम से ग्रस्त हैं, क्रोध से ग्रस्त हैं, लोभ से ग्रस्त हैं, अहंकार से ग्रस्त हैं । लेकिन विचित्रता क्या है ? इस प्रसंग को रामायण में किस नाम से प्रस्तुत किया गया है ? काकभुशुण्डिजी कथा सुनाते हुए नारद के मोह का वर्णन करते हैं और ठीक यही शब्द पार्वतीजी और शंकरजी के संवाद में आता है । जब शंकरजी नारद का चरित्र पार्वतीजी को सुनाते हैं, तो वे यह नहीं कहतीं कि नारदजी के मन अहंकार कैसे आ गया, बल्कि कहती हैं - देवर्षि नारद के मन में मोह कैसे उत्पन्न हो गया, इसका मुझे बड़ा आश्चर्य है । इस प्रकार इस नारद - प्रसंग को नारद-मोह के रूप में प्रस्तुत किया गया है ।
Sunday, 10 April 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
मानस-रोग प्रसंग में जितने दुर्गुण हैं, उनकी तुलना किसी-न-किसी रोग से की गयी है, जैसे कहा गया है कि काम वात है, क्रोध पित्त है, लोभ कफ है, अहंकार डमरुआ है, दम्भ-कपट-मद-मान नेहरुआ है, तृष्णा उदर-वृद्धि (जलोदर) है तथा मनुष्य के अन्तःकरण में जो तीन प्रकार की इच्छाएँ हैं, वे तिजारी ज्वर हैं, पर विचित्रता यह है कि इस वर्णन के प्रारंभ में एक दुर्गुण का नाम तो लिया गया, किन्तु उसकी किसी रोग से तुलना नहीं की गई । मानस-रोगों का वर्णन करते समय पहली पंक्ति में आती है - वह मोह ही है, जो सारे मानस-रोगों के मूल में विद्यमान है । यहाँ पर काकभुशुण्डिजी मोह को व्याधियों का मूल तो बताते हैं, लेकिन वे अर्न्तमन के इस दुर्गुण से अन्य किसी शारीरिक रोग से तुलना नहीं करते, मात्र यहा कहकर वे आगे बढ़ जाते हैं कि यह मोह ही समस्त व्याधियों के मूल में है ।
Saturday, 9 April 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
यदि रामकथा को केवल मनोरंजन के रूप में ग्रहण किया जाय तो व्यक्ति को उससे तत्काल आनंद की अनुभूति तो होगी, पर उसके जीवन में समस्याओं का समाधान नहीं होगा । अब ऐसी क्षणिक आनन्द की अनुभूति तो जितने मनोरंजन होते हैं, उन सब में होती है । उतनी देर के लिए व्यक्ति अन्य बातों को भूलकर मनोरंजन में खो जाता है । पर उस मनोरंजन का वास्तविक लाभ तो तब है, जब वहाँ से उठने के बाद भी व्यक्ति अस्वस्थता का अनुभव न कर अपने आपको स्वस्थ अनुभव करे । तो यहाँ पर रामकथा की समाप्ति का जो क्रम है, उसमें मन, बुद्धि और चित्त, इन तीनों के स्तर के लिए है । इस क्रम में पहले यह दर्शाया गया है कि व्यक्ति का मन रुग्ण है, अस्वस्थ है । जब कोई व्यक्ति अस्वस्थ होता है, तो उसके घर में कितनी भी समृद्धि और सुविधा क्यों न हो, उसे चैन नहीं मिलता है, इसी प्रकार व्यक्ति बाह्य दृष्टि से कितना भी उन्नत क्यों न हो, लेकिन यदि वह अन्तर्मन की दृष्टि से अस्वस्थ है, तो किसी प्रकार से सच्ची शान्ति का, सच्ची समाधि का अनुभव नहीं कर सकता । यही कारण है कि गोस्वामीजी यह सोचकर कि कथा की समाप्ति केवल मनोरंजन से न हो जाए, अन्त में मन के रोगों और उनकी चिकित्सा का वर्णन करते हैं, जिससे हम रामकथा को अपने जीवन से जोड़ सकें और उसके माध्यम से अपनी मानसिक अस्वस्थता को, मानसिक रोगों को दूर कर सकें । इस दृष्टि से मानस-रोग का प्रसंग मधुर न होते हुए भी बड़ा प्रेरक है और मनुष्य के अन्तर्मन का बड़ा अच्छा चित्र उपस्थित करता है ।
Friday, 8 April 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........
रामकथा में अनेक गुण विद्यमान हैं । पर वस्तुतः रामकथा का उद्देश्य क्या है ? वैसे तो मनोरंजन की दृष्टि से भी रामकथा कही और सुनी जाती है । अगर अन्य मनोरंजनों के स्थान पर हम रामकथा से मनोरंजन प्राप्त करते हैं, तो यह कोई निन्दा की बात नहीं, प्रशंसा की बात है । गोस्वामीजी स्वयं स्वीकार करते हैं कि एक विषयी व्यक्ति जब रामकथा को सुनता है, तो उसके कानों को वह बड़ी प्रिय लगती है, उसके मन को सुख प्राप्त होता है । लेकिन रामकथा का उद्देश्य केवल मन तक ही सीमित नहीं है । उसे हम यों कह सकते हैं कि सुनने के मुख्य रूप से तीन माध्यम हैं - मन, बुद्धि और चित्त । फिर संसार में व्यक्ति भी तीन प्रकार के होते हैं - विषयी, साधक और सिद्ध । विषयी मुख्य रूप से मन के माध्यम से सुनता है । पर साधक केवल मन का ही प्रयोग नहीं करता, अपितु उसके साथ-साथ अपनी बुद्धि के माध्यम से रामकथा को ग्रहण करता है । और जो सिद्ध व्यक्ति है, उसके लिए रामकथा केवल मन और बुद्धि का विषय नहीं है, वह तो चित्त से रामकथा के साथ एकाकार होकर, तन्मय होकर, तदाकार होकर साक्षात कथा का ही रूप बन जाता है । इस तरह कह सकते हैं कि रामकथा विषयी, साधक और सिद्ध के लिए क्रमशः उत्कृष्ट से उत्कृष्टतम रूप में सामने आती है ।
Thursday, 7 April 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
रावण तब मरेगा जब चारों स्थानों पर प्रहार होगा। 'भुजा' कट जाएँ, 'सिर' कटे, 'ह्रदय' में बाण लगे और 'नाभि' का अमृतकुण्ड सूखे। यही चारों मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार के केन्द्र हैं। सीधा-सा अभिप्राय है कि बुराई चारों स्थान से मिटे। मन से, बुद्धि से, अहंकार से और इन सबसे नीचे जो छिपा हुआ है, जो नाभि 'चित्त', का मूल केन्द्र है, उसी में संस्कारों का अमृतकुण्ड है। इसे यों कह लीजिए कि सुन करके हम बुराई का विरोध तो करते हैं, पर चित्त में संस्कारों का ऐसा अमृतकुण्ड है कि जिससे फिर नया सिर निकल आता है। और इसके लिए हमें सिर पर अर्थात बुद्धि पर प्रहार करना होगा। भुजा पर प्रहार, माने अहंकार पर प्रहार, ह्रदय पर प्रहार, मानो मन पर प्रहार और नाभि पर प्रहार का अभिप्राय माने चित्त पर प्रहार करना होगा। प्रभु ने बाण मारकर रावण का अमृतकुण्ड सुखाया। जब श्रीराम ने रावण पर इकतीस बाणों से प्रहार किया तो रावण की मृत्यु हो गई। इसका सरल-सा तात्पर्य है कि मन, बुद्धि, अहं के साथ-साथ जब तक चित्त में छिपी हुई बुराइयाँ न मिटें तब तक पूर्णता नहीं आएगी।
Wednesday, 6 April 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
सुतीक्ष्णजी से भगवान राम ने कहा - माँगो ! तो सुतीक्ष्णजी बोले - महाराज ! मुझे समझ में नहीं आता कि क्या माँगना चाहिए, इसलिए आपको जो अच्छा लगे, वही दे दीजिए और जब भगवान दे चुके, तो कहने लगे - आपको जो अच्छा लगा, वह आपने दिया, अब मुझे जो अच्छा लगता है, वह मुझे दीजिए । भगवान हँसने लगे । बोले - अभी तो तुम कह रहे थे कि तुम्हें माँगना नहीं आता । बोले - आता तो नहीं था, पर अभी आपने जो ज्ञान दे दिया न ! इसलिए अब बुद्धि आ गयी । अब मैं समझ गया हूँ कि क्या माँगना चाहिए ? सुतीक्ष्णजी माँगते हैं - आप मेरे ह्रदय में निवास कीजिए । भगवान ने कहा - अच्छा ! यह भी दिया । मुनिजी बोले - महाराज ! चलते-चलते एक वस्तु और देते जाइए ! भगवान मुस्कराकर देखने लगे, लोभ तो बढ़ता ही जा रहा है ! सुतीक्ष्णजी ने कहा - महाराज ! मैं आपसे एक ऐसी वस्तु माँग रहा हूँ, जिसे कोई नहीं माँगता और आपके पास बेकार पड़ी हुई है । बताइए तो ! अभिमान माँगने आपके पास कभी कोई आया है ? प्रभु बोले - नहीं भाई ! ऐसा तो कोई नहीं आया । बस तो वह वस्तु जो आपके पास बेकार पड़ी हुई है, मुझे दे दीजिए! - मैं आपका सेवक हूँ, आप मेरे स्वामी हैं, बस यही अभिमान मुझमें बना रहे और कोई अभिमान जीवन में शेष न रहे । यह अभिमान मानो सारे अभिमानों को काटनेवाला है । यह है भगवत्कृपा के द्वारा अभिमान पर विजय ।
Tuesday, 5 April 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
वर्णन आता है कि कुम्भकर्ण बंदरों को उठा-उठाकर खाने लगा । समस्त बंदर ही साधन के रूप में सत्कर्म और सद्गुण हैं । सारे सत्कर्म और सद्गुण कुम्भकर्ण के मुँह में समाये जा रहे हैं । क्या हो गया है ? इतने सत्कर्म करने के बाद भी अभिमान पर विजय प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं ! कुम्भकर्ण खाता चला जा रहा है । अंत में संकेत यही है कि सब हार जाते हैं । सुग्रीव को कुम्भकर्ण बगल में दबा लेता है । वे किसी तरह छूटकर भागे और भगवान की शरण में आकर बोले - महाराज ! बड़ी भूल हो गयी, आपको बिना बताये ही हम लड़ने चले गए । यह दुष्ट तो सबको खाये जा रहा है । भगवान बोले - अच्छा, चलो ! बंदर बोले - महाराज ! हम लोग तो जाकर भोग चुके हैं । प्रभु बोले - ठीक है, आगे नहीं तो पीछे चलो, पर चलो तो सही ! गोस्वामीजी ने कहा - भगवान राम आगे बढ़कर कुम्भकर्ण से युद्ध करने लगे । कुम्भकर्ण की दो भुजाएँ हैं, 'मैं' और 'तू' । भगवान उसे काट देते हैं और अंत में उसका शिर भी काट देते हैं । कुम्भकर्ण का तेज निकलकर भगवान में समा जाता है । इसका अर्थ क्या है ? अभिमान जब भगवान से मिल जाय, तब वह क्षुद्र 'अहं' नहीं रह जाता, वह भगवान से एकाकार होकर विराट 'अहं' हो जाता है । तब वही कुम्भकर्ण शिव स्वरूप हो जाता है ।
Monday, 4 April 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
कुम्भकर्ण जब युद्ध के लिए जाने लगा, रावण ने पूछा कि कितनी सेना आपके साथ कर दें ? कुम्भकर्ण हँसने लगा, बोला - यह सेना-वेना लेकर तुम जाया करो, हम तो अकेले ही लड़ते हैं । हमारे जीवन में भी यही दिखायी देता है, अन्य दुर्गुण तो सेना लेकर आते हैं, लेकिन अभिमान कहता है कि हम अकेले ही काफी हैं, अकेले ही सबको समाप्त कर देंगे । यहाँ भी वही हुआ । बंदरों ने जब देखा कि अकेले चला आ रहा है, तो सोचा कि अब भगवान से पूछने की क्या आवश्यकता है ; इस अकेले को मारने के लिए हम लोग ही काफी हैं । यही पुण्याभिमान है । बंदर बड़े उत्साहित होकर दौड़ पड़े और लगे उस पर वृक्ष-पर्वत फेंकने । इस पर गोस्वामीजी से किसी ने पूछा कि इस प्रहार से कुम्भकर्ण को चोट तो अवश्य लगी होगी ? बोले, बस !- उसे तो खुजली मिटाने का आनन्द मिल रहा था कि चलो भाई! कोई खुजला रहा है । जिन साधनों के द्वारा हम अभिमान को मिटाना चाहते हैं, उनसे तो अभिमान की खुजली ही मिटाते हैं, उससे उसका कुछ खास नहीं बिगड़ता ।
Sunday, 3 April 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
गोस्वामीजी से किसी ने पूछा - महाराज ! मनुष्य के जीवन में पाप को मिटाने के लिए सत्कर्म का प्रहार किया जा रहा है, किन्तु फिर भी पाप रक्तबीज की तरह बढ़ता ही जा रहा है, इसके विनाश का उपाय क्या है ? गोस्वामीजी ने कहा - यह कालिका कौन है ? बोले - भगवान की कृपा ही कालिका है । यह एक सूत्र है और इसका सीधा-सा अर्थ यह है कि सत्कर्म करते हुए 'मैं करने वाला हूँ' यह वृत्ति न आने पाये । कर्त्तापन की वृत्ति आने पर रक्तबीज बढ़ेगा । सत्कर्म करते हुए भी अगर यह वृत्ति बनी रहेगी कि भगवान ने ही कृपा करके मुझसे यह कार्य कराया, तब तो रक्तबीज उत्पन्न नहीं होगा । अन्यथा यह बढ़ता ही जायेगा और कभी इसका विनाश नहीं होगा । इसलिए 'अहं' के विनाश की जो प्रक्रिया है, उसका संकेत 'मानस' में कुम्भकर्ण के संदर्भ में किया गया है । कुम्भकर्ण को जगाया गया । कब जगाया गया ? जब रावण की आधी सेना मारी जा चुकी थी । यही अभिमान का मनोविज्ञान है । आधे दुष्कर्म मिट जाते हैं, तब कुम्भकर्ण रूपी अहं को जगाया जाता है । इसका अभिप्राय यह है कि लोभ को मिटाने के लिए दान किया, तो लोभ कुछ घटा, लेकिन उसके साथ ही तुरन्त 'मैं दानी हूँ', यही अभिमान का कुम्भकर्ण जाग उठा । बस ! सत्कर्म के द्वारा आधे पाप के नष्ट होते ही इसके जागने का बड़ा डर है ।
Saturday, 2 April 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
पुराणों में एक रक्तबीज नामक राक्षस की कथा है । उसकी विशेषता यह थी कि जब उस पर प्रहार किया जाता था, तो उसके शरीर से रक्त की जितनी बूँदे जमीन पर गिरतीं, उतने ही रक्तबीज उत्पन्न हो जाते । गोस्वामीजी ने कहा - पाप है रक्तबीज और पुण्य है तलवार । जब हम पुण्य का तलवार पाप पर चलाते हैं, तब क्या होता है ? रक्तबीज की तरह पाप बढ़ता ही चला जाता है । यह बड़ा महत्वपूर्ण सूत्र हैं । इसका अभिप्राय क्या है ? जब हम पाप को नष्ट करने के लिए उसी पर पुण्य का प्रहार करते हैं, तब परिणाम क्या होता है ? उसी प्रहार से पाप का शिर कट गया, पर क्या वह मरा ? वहाँ तो रक्तबीज की तरह हजारों पाप उत्पन्न हो गये । और ये हजारों पाप क्या हैं ? ये हैं सत्कर्म का अभिमान । मैंने इतनी पूजा की, इतना पाठ किया, इतना सत्कर्म किया, इतना दान दिया, जिधर देखो उधर ही चारों ओर हजारों रक्तबीज उत्पन्न हो गये । अब इस रक्तबीज को मारने का उपाय क्या है ? उपाय यह है कि रक्तबीज को कोई ऐसा मारे कि उसके रक्त का एक बूँद भी जमीन पर न गिरने दे । देवी ने उसका गला काटकर तुरन्त उसके रक्त को पी लिया, एक बूँद भी जमीन पर नहीं गिरने दी । तब रक्तबीज मारा गया और नये रक्तबीज उत्पन्न नहीं हुए । सत्कर्म के द्वारा जब पाप पर प्रहार किया जायेगा और वह अधोगामी होगा, तो पुनः रक्तबीजों की सृष्टि होगी । अब उपाय क्या है ? देवी अगर उसके रक्त की एक बूँद भी न गिरने दें, तभी रक्तबीज का विनाश होगा ।
Friday, 1 April 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........
'अहं' की समग्रता शिव में ही है । वहाँ न द्वैत है, न कुटिलता और न कपट । वहाँ परपीड़न की वृत्ति नहीं है । क्षुद्र 'अहं' द्वैतसृष्टि करता है और राग-द्वेष, कपटता, कुटिलता, स्वार्थ तथा परपीड़न की वृत्ति को जन्म देता है । उसमें हिंसा और अशांति है, परन्तु शिव परमशान्ति, समाधि, अद्वैत तथा अहिंसा की अवस्था है । शिव मूर्तिमान विश्वास हैं और यह क्षुद्र 'अहं' विश्वास में बाधक है । विश्वास में प्रतिष्ठित होने के लिए यह विराट 'अहं' ही सहायक है । किन्तु यह 'अहं' बिरले ही व्यक्तियों में दिखलायी देता है । हम लोगों में तो किसी न किसी तरह का क्षुद्र 'अहं' ही विद्यमान है । दक्ष को अपने प्रजापतित्व का अभिमान है । हममें से किसी को जाति का, किसी को पद का, किसी को धन का, तो किसी को पुण्य का अभिमान है ।
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