मानस-रोग प्रसंग में जितने दुर्गुण हैं, उनकी तुलना किसी-न-किसी रोग से की गयी है, जैसे कहा गया है कि काम वात है, क्रोध पित्त है, लोभ कफ है, अहंकार डमरुआ है, दम्भ-कपट-मद-मान नेहरुआ है, तृष्णा उदर-वृद्धि (जलोदर) है तथा मनुष्य के अन्तःकरण में जो तीन प्रकार की इच्छाएँ हैं, वे तिजारी ज्वर हैं, पर विचित्रता यह है कि इस वर्णन के प्रारंभ में एक दुर्गुण का नाम तो लिया गया, किन्तु उसकी किसी रोग से तुलना नहीं की गई । मानस-रोगों का वर्णन करते समय पहली पंक्ति में आती है - वह मोह ही है, जो सारे मानस-रोगों के मूल में विद्यमान है । यहाँ पर काकभुशुण्डिजी मोह को व्याधियों का मूल तो बताते हैं, लेकिन वे अर्न्तमन के इस दुर्गुण से अन्य किसी शारीरिक रोग से तुलना नहीं करते, मात्र यहा कहकर वे आगे बढ़ जाते हैं कि यह मोह ही समस्त व्याधियों के मूल में है ।
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