Thursday, 7 April 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

रावण तब मरेगा जब चारों स्थानों पर प्रहार होगा। 'भुजा' कट जाएँ, 'सिर' कटे, 'ह्रदय' में बाण लगे और 'नाभि' का अमृतकुण्ड सूखे। यही चारों मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार के केन्द्र हैं। सीधा-सा अभिप्राय है कि बुराई चारों स्थान से मिटे।  मन से, बुद्धि से, अहंकार से और इन सबसे नीचे जो छिपा हुआ है, जो नाभि 'चित्त', का मूल केन्द्र है, उसी में संस्कारों का अमृतकुण्ड है। इसे यों कह लीजिए कि सुन करके हम बुराई का विरोध तो करते हैं, पर चित्त में संस्कारों का ऐसा अमृतकुण्ड है कि जिससे फिर नया सिर निकल आता है। और इसके लिए हमें सिर पर अर्थात बुद्धि पर प्रहार करना होगा। भुजा पर प्रहार, माने अहंकार पर प्रहार, ह्रदय पर प्रहार, मानो मन पर प्रहार और नाभि पर प्रहार का अभिप्राय माने चित्त पर प्रहार करना होगा। प्रभु ने बाण मारकर रावण का अमृतकुण्ड सुखाया। जब श्रीराम ने रावण पर इकतीस बाणों से प्रहार किया तो रावण की मृत्यु हो गई। इसका सरल-सा तात्पर्य है कि मन, बुद्धि, अहं के साथ-साथ जब तक चित्त में छिपी हुई बुराइयाँ न मिटें तब तक पूर्णता नहीं आएगी।

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