रामायण का एक प्रसंग तो मोह की बड़ी ही सांकेतिक व्याख्या करता है, और वह है देवर्षि नारद का प्रसंग । वैसे देवर्षि नारद का जो चरित्र है, उसमें अनेक मानस-रोगों का वर्णन किया गया है, यह भी बताया गया है कि देवर्षि नारद के मन में तीव्र काम का उदय हुआ, ऐसा भी वर्णन आता है कि उनमें तीव्र क्रोध का उदय हो गया, फिर यह भी कहा गया कि उनमें काम पर विजय के पश्चात अहंकार उत्पन्न हो गया था । इस प्रकार नारद काम से ग्रस्त हैं, क्रोध से ग्रस्त हैं, लोभ से ग्रस्त हैं, अहंकार से ग्रस्त हैं । लेकिन विचित्रता क्या है ? इस प्रसंग को रामायण में किस नाम से प्रस्तुत किया गया है ? काकभुशुण्डिजी कथा सुनाते हुए नारद के मोह का वर्णन करते हैं और ठीक यही शब्द पार्वतीजी और शंकरजी के संवाद में आता है । जब शंकरजी नारद का चरित्र पार्वतीजी को सुनाते हैं, तो वे यह नहीं कहतीं कि नारदजी के मन अहंकार कैसे आ गया, बल्कि कहती हैं - देवर्षि नारद के मन में मोह कैसे उत्पन्न हो गया, इसका मुझे बड़ा आश्चर्य है । इस प्रकार इस नारद - प्रसंग को नारद-मोह के रूप में प्रस्तुत किया गया है ।
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