Thursday, 28 April 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

नारद ने अहंकार की घास को काटने की, मिटाने की चेष्टा नहीं की, अपितु शंकरजी के पास चले गए । वैसे तो भोजन से पेट भर जाता है, पर आपको ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिलेगा, जो प्रशंसा के भोजन से अघा गया हो, जो कहता हो कि अब मुझे प्रशंसा नहीं चाहिए । होता यह है कि व्यक्ति को जितनी प्रशंसा मिलती है, उसकी प्रशंसा की भूख उतनी ही बढ़ती जाती है । तो, नारद की प्रशंसा की भूख इतनी बढ़ गई कि वे सोचने लगे - काम ने तो प्रशंसा कर ही दी है, अब जरा कामारि से भी अपनी प्रशंसा सुन लें ।

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