Saturday, 2 April 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

पुराणों में एक रक्तबीज नामक राक्षस की कथा है । उसकी विशेषता यह थी कि जब उस पर प्रहार किया जाता था, तो उसके शरीर से रक्त की जितनी बूँदे जमीन पर गिरतीं, उतने ही रक्तबीज उत्पन्न हो जाते । गोस्वामीजी ने कहा - पाप है रक्तबीज और पुण्य है तलवार । जब हम पुण्य का तलवार पाप पर चलाते हैं, तब क्या होता है ? रक्तबीज की तरह पाप बढ़ता ही चला जाता है । यह बड़ा महत्वपूर्ण सूत्र हैं । इसका अभिप्राय क्या है ? जब हम पाप को नष्ट करने के लिए उसी पर पुण्य का प्रहार करते हैं, तब परिणाम क्या होता है ? उसी प्रहार से पाप का शिर कट गया, पर क्या वह मरा ? वहाँ तो रक्तबीज की तरह हजारों पाप उत्पन्न हो गये । और ये हजारों पाप क्या हैं ? ये हैं सत्कर्म का अभिमान । मैंने इतनी पूजा की, इतना पाठ किया, इतना सत्कर्म किया, इतना दान दिया, जिधर देखो उधर ही चारों ओर हजारों रक्तबीज उत्पन्न हो गये । अब इस रक्तबीज को मारने का उपाय क्या है ? उपाय यह है कि रक्तबीज को कोई ऐसा मारे कि उसके रक्त का एक बूँद भी जमीन पर न गिरने दे । देवी ने उसका गला काटकर तुरन्त उसके रक्त को पी लिया, एक बूँद भी जमीन पर नहीं गिरने दी । तब रक्तबीज मारा गया और नये रक्तबीज उत्पन्न नहीं हुए । सत्कर्म के द्वारा जब पाप पर प्रहार किया जायेगा और वह अधोगामी होगा, तो पुनः रक्तबीजों की सृष्टि होगी । अब उपाय क्या है ? देवी अगर उसके रक्त की एक बूँद भी न गिरने दें, तभी रक्तबीज का विनाश होगा ।

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