Saturday, 30 April 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

नारदजी को ध्यान के समय अप्सराओं ने व्यामोह में भले ही न डाला हो, पर वे उन्हें भूल नहीं पाए हैं और वे सारे दृश्य उनके मन में ज्यों के त्यों विद्यमान हैं । राम का उन्होंने इतनी देर जो ध्यान किया, वह तो उन्हें बिसर गया, पर काम का ध्यान बना रहा। इस प्रकार नारद रस लेकर काम की, अप्सराओं की, उनके श्रृंगार की और उन पर विजय पाने की पूरी गाथा शंकरजी को सुना देते हैं । अधिकांशतः बहुत से वक्ता अपनी बात सुनाने के बाद अन्त में पास वालों से पूछते हैं - क्यों कैसा रहा ? जमा कि नहीं ? यह भी कान की भूख है कि कोई कहे कि बहुत अच्छा हुआ । नारदजी भी भूख से प्रेरित होकर शंकरजी की ओर देखते हैं, मानो पूछना चाहते हैं कि कथा अच्छी लगी या नहीं ? यह देखकर शंकरजी के मन में बड़ी दया हो आई कि नारद रोगी हो गए । यदि कोई अज्ञानी व्यक्ति अहंकारी हो जाए, तब तो उसको बताया भी जाय कि अहंकार का त्याग करो । परंतु जो व्यक्ति जानता है कि अहंकार जीवन में सबसे बुरी वस्तु है, अतः कभी अहंकार नहीं करना चाहिए, वही यदि आज अभिमान करके, भगवान को भुलाकर अपना चरित्र सुनावे, तो दया का ही पात्र हो सकता है ।

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