......कल से आगे ......
नारदजी के अन्तःकरण में अन्तर्मुखता की वृत्ति आ गयी और वे बैठकर ध्यान में लीन हो गए । फलस्वरूप प्रजापति का शाप व्यर्थ चला गया, क्योंकि शाप तो तब कार्य करता, जब नारद देश और काल की सीमा में होते । वे तो ध्यान में बैठकर देश-काल और व्यक्तित्व की सीमा से ऊपर उठ गये थे । इसका अर्थ यह है कि यदि ध्यान में बैठने पर भी यह याद बनी रहे कि मैं कहाँ बैठा हूँ, कितना समय हुआ है, मैं कौन हूँ, तो समझ लेना चाहिए कि ध्यान बिल्कुल अधूरा है । उदाहरणार्थ, जब यह कहते हैं कि ध्यान कीजिए कि अयोध्या नगर में सरयू बह रही है, सरयूजी के किनारे एक कल्पतरू है, कल्पतरू के नीचे एक सिंहासन है और उस सिंहासन पर भगवान राम और सीताजी बैठे हुए हैं, तब यदि व्यक्ति देश के प्रति सजग होगा, तो उसे लगेगा कि नहीं, मैं तो इस शहर में ही बैठा हुआ हूँ । वह अयोध्या या वृन्दावन या उस देश की भावना नहीं कर पायेगा, जहाँ का वह ध्यान करना चाहता है । फलस्वरूप उसमें तन्मयता नहीं आ पाएगी । इसी प्रकार जब काल का चिन्तन करेगा, तब भी उसे दूरी की अनुभूति होगी । उसे लगेगा कि भगवान का अवतार तो कितना पहले हुआ था, अतः हमारे और उनके काल में बड़ी दूरी है । अब राम भला कहाँ हैं, कृष्ण कहाँ हैं ! इसका परिणाम यह होगा कि उसको सच्चा ध्यान नहीं लग पायेगा । इसी प्रकार सच्चे ध्यान के लिए व्यक्तित्व की सीमा को भी लाँघना पड़ता है । जैसे भगवान का ध्यान करता हुआ व्यक्ति अपने आपको कुछ न कुछ करता हुआ पाता है । भक्त ध्यान करता हुआ देखता है कि वह माला गूँथकर भगवान को पहना रहा है । अब वह अपने आपको जिस शरीर से माला पहनाता हुआ देखता है, वह स्थूल शरीर तो है नहीं, वह तो उसका भावनात्मक शरीर है । ऐसी स्थिति में अगर उसका स्थूल शरीर ही उसके चिन्तन में आता रहा, तो वह सच्ची तन्मयता प्राप्त नहीं कर सकेगा ।
नारदजी के अन्तःकरण में अन्तर्मुखता की वृत्ति आ गयी और वे बैठकर ध्यान में लीन हो गए । फलस्वरूप प्रजापति का शाप व्यर्थ चला गया, क्योंकि शाप तो तब कार्य करता, जब नारद देश और काल की सीमा में होते । वे तो ध्यान में बैठकर देश-काल और व्यक्तित्व की सीमा से ऊपर उठ गये थे । इसका अर्थ यह है कि यदि ध्यान में बैठने पर भी यह याद बनी रहे कि मैं कहाँ बैठा हूँ, कितना समय हुआ है, मैं कौन हूँ, तो समझ लेना चाहिए कि ध्यान बिल्कुल अधूरा है । उदाहरणार्थ, जब यह कहते हैं कि ध्यान कीजिए कि अयोध्या नगर में सरयू बह रही है, सरयूजी के किनारे एक कल्पतरू है, कल्पतरू के नीचे एक सिंहासन है और उस सिंहासन पर भगवान राम और सीताजी बैठे हुए हैं, तब यदि व्यक्ति देश के प्रति सजग होगा, तो उसे लगेगा कि नहीं, मैं तो इस शहर में ही बैठा हुआ हूँ । वह अयोध्या या वृन्दावन या उस देश की भावना नहीं कर पायेगा, जहाँ का वह ध्यान करना चाहता है । फलस्वरूप उसमें तन्मयता नहीं आ पाएगी । इसी प्रकार जब काल का चिन्तन करेगा, तब भी उसे दूरी की अनुभूति होगी । उसे लगेगा कि भगवान का अवतार तो कितना पहले हुआ था, अतः हमारे और उनके काल में बड़ी दूरी है । अब राम भला कहाँ हैं, कृष्ण कहाँ हैं ! इसका परिणाम यह होगा कि उसको सच्चा ध्यान नहीं लग पायेगा । इसी प्रकार सच्चे ध्यान के लिए व्यक्तित्व की सीमा को भी लाँघना पड़ता है । जैसे भगवान का ध्यान करता हुआ व्यक्ति अपने आपको कुछ न कुछ करता हुआ पाता है । भक्त ध्यान करता हुआ देखता है कि वह माला गूँथकर भगवान को पहना रहा है । अब वह अपने आपको जिस शरीर से माला पहनाता हुआ देखता है, वह स्थूल शरीर तो है नहीं, वह तो उसका भावनात्मक शरीर है । ऐसी स्थिति में अगर उसका स्थूल शरीर ही उसके चिन्तन में आता रहा, तो वह सच्ची तन्मयता प्राप्त नहीं कर सकेगा ।
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