Wednesday, 27 April 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

नारद ने यदि भरतजी की तरह ही किया होता और काम की प्रशंसा सुनकर यदि गदगद होकर सोचते कि भगवान कितने कृपामय हैं जो दुर्गुणों से मुझे बचा लिया और काम-क्रोध-लोभ से मुझे सुरक्षित रखा, तो प्रशंसा भगवान को अर्पित हो जाती और नारद अहंकार से न बँध पाते । पर नारद बहुत दिनों से भूखे थे ! जैसे सभी इन्द्रियों की अपनी भूख होती है, वैसे ही कान की भी तो भूख होती है, तो नारद को बहुत दिनों से कान से प्रशंसा के शब्द सुनने को नहीं मिले थे, इसलिए जब प्रशंसा का भोजन आया तो उन्होंने पूरा आनन्द लेते हुए भोजन किया । वे फिर विष्णु भगवान के पास भी पहुँच गये और जब वे भी प्रशंसा करने लगे, तब नारदजी ने सोचा कि अब तो भोग लगा ही देना चाहिए । वे भगवान से कहते हैं -
    नारद कहेउ सहित अभिमाना ।
    कृपा तुम्हारि सकल भगवाना ।।
अब यदि यह बात पहले ही नारदजी की समझ में आ जाती, तो वे सारे दुर्गुणों से ही मुक्त हो जाते । पर दुर्भाग्य यह है कि उनके मन में भगवान की स्मृति नहीं आई, उन्हें केवल अपनी श्रेष्ठता का स्मरण आया । इस प्रकार एक ओर जहाँ उन्होंने अपने अन्तःकरण में सत्कर्म का, साधना का इतना पवित्र धान्य उपजाया, वहीं अहंकार के बीज भी अंकुरित हो गए ।

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