Monday, 4 April 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

कुम्भकर्ण जब युद्ध के लिए जाने लगा, रावण ने पूछा कि कितनी सेना आपके साथ कर दें ? कुम्भकर्ण हँसने लगा, बोला - यह सेना-वेना लेकर तुम जाया करो, हम तो अकेले ही लड़ते हैं । हमारे जीवन में भी यही दिखायी देता है, अन्य दुर्गुण तो सेना लेकर आते हैं, लेकिन अभिमान कहता है कि हम अकेले ही काफी हैं, अकेले ही सबको समाप्त कर देंगे । यहाँ भी वही हुआ । बंदरों ने जब देखा कि अकेले चला आ रहा है, तो सोचा कि अब भगवान से पूछने की क्या आवश्यकता है ; इस अकेले को मारने के लिए हम लोग ही काफी हैं । यही पुण्याभिमान है । बंदर बड़े उत्साहित होकर दौड़ पड़े और लगे उस पर वृक्ष-पर्वत फेंकने । इस पर गोस्वामीजी से किसी ने पूछा कि इस प्रहार से कुम्भकर्ण को चोट तो अवश्य लगी होगी ? बोले, बस !- उसे तो खुजली मिटाने का आनन्द मिल रहा था कि चलो भाई! कोई खुजला रहा है । जिन साधनों के द्वारा हम अभिमान को मिटाना चाहते हैं, उनसे तो अभिमान की खुजली ही मिटाते हैं, उससे उसका कुछ खास नहीं बिगड़ता ।

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