सुतीक्ष्णजी से भगवान राम ने कहा - माँगो ! तो सुतीक्ष्णजी बोले - महाराज ! मुझे समझ में नहीं आता कि क्या माँगना चाहिए, इसलिए आपको जो अच्छा लगे, वही दे दीजिए और जब भगवान दे चुके, तो कहने लगे - आपको जो अच्छा लगा, वह आपने दिया, अब मुझे जो अच्छा लगता है, वह मुझे दीजिए । भगवान हँसने लगे । बोले - अभी तो तुम कह रहे थे कि तुम्हें माँगना नहीं आता । बोले - आता तो नहीं था, पर अभी आपने जो ज्ञान दे दिया न ! इसलिए अब बुद्धि आ गयी । अब मैं समझ गया हूँ कि क्या माँगना चाहिए ? सुतीक्ष्णजी माँगते हैं - आप मेरे ह्रदय में निवास कीजिए । भगवान ने कहा - अच्छा ! यह भी दिया । मुनिजी बोले - महाराज ! चलते-चलते एक वस्तु और देते जाइए ! भगवान मुस्कराकर देखने लगे, लोभ तो बढ़ता ही जा रहा है ! सुतीक्ष्णजी ने कहा - महाराज ! मैं आपसे एक ऐसी वस्तु माँग रहा हूँ, जिसे कोई नहीं माँगता और आपके पास बेकार पड़ी हुई है । बताइए तो ! अभिमान माँगने आपके पास कभी कोई आया है ? प्रभु बोले - नहीं भाई ! ऐसा तो कोई नहीं आया । बस तो वह वस्तु जो आपके पास बेकार पड़ी हुई है, मुझे दे दीजिए! - मैं आपका सेवक हूँ, आप मेरे स्वामी हैं, बस यही अभिमान मुझमें बना रहे और कोई अभिमान जीवन में शेष न रहे । यह अभिमान मानो सारे अभिमानों को काटनेवाला है । यह है भगवत्कृपा के द्वारा अभिमान पर विजय ।
No comments:
Post a Comment