काम अप्सराओं को लेकर नारद के पास आता है, पर नारदजी के मन पर अप्सराओं के मोहक हाव-भाव, नृत्य आदि का रंचमात्र प्रभाव नहीं पड़ता । वे शान्त भाव से बैठे रहते हैं । यह देख काम के मन में भय उत्पन्न होता है कि कहीं मुनि क्रोध करके मुझे भस्म न कर दें । नारद शान्त भाव से काम को देखते हैं । काम डर के मारे उनके चरणों में आ गिरता है और कहता है - महाराज, मैंने जो कुछ किया है, वह इन्द्र के कहने पर किया है । काम के कथन का अर्थ यही है कि यदि दण्ड देना हो तो इन्द्र को दीजियेगा, मुझे नहीं । यही व्यक्ति के जीवन की विडंबना है । अभी तक तो काम इन्द्र का सहयोगी बना हुआ था, और अब जब अपने उद्यम में असफल हो गया, तब कहता है कि मैंने यहीं अपनी इच्छा से नहीं किया है ! फिर भी नारद को क्रोध नहीं आया और उन्होंने मुस्कुराकर काम से कहा- तुम इन्द्र से जाकर कह देना कि मेरे अन्तःकरण में स्वर्ग का कोई लोभ नहीं है, वह आनन्द से स्वर्ग के भोगों को भोगे, राज्य करे । काम नारद के चरणों में प्रणाम करके चला गया । लेकिन एक विचित्र बात हो गयी । अभी नारद के जीवन में सद् विचारों की, सत्कर्मों की, साधना की इतनी बढ़िया खेती हुई थी, पर अब उसकी बगल में घास उग आई और नारद उस घास को अनदेखा कर देते हैं, घास की पहचान नहीं कर पाते हैं । यही नारद की समस्या है ।
......क्रमशः ......
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