Tuesday, 26 April 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

 .....कल से आगे .....
भगवान ने पूछा, "अच्छा, दोष देखना यदि मुझे नहीं आता तो गुण देखना तो आता है ?" भरतजी बोले, महाराज, गुण देखना आपको आता तो है, पर मैं आपसे पूछता हूँ यदि तोता बहुत बढ़िया श्लोक पढ़ने लगे और बन्दर बहुत बढ़िया नाचने लगे तो यह बन्दर या तोते की विशेषता है अथवा पढ़ाने और नचानेवाले की ? भगवान ने कहा, पढ़ाने और नचानेवाले की । भरतजी बोले, महाराज, बिल्कुल ठीक कहा आपने । मैं तो तोते और बन्दर की तरह हूँ । यदि मुझमें कोई विशेषता दिखाई देती है तो पढ़ाने और नचानेवाले तो आप ही हैं । इसलिए यह प्रशंसा आपको ही अर्पित है । भगवान ने भरत से कहा, भरत, तो प्रशंसा तुमने लौटा दी । भरतजी बोले, प्रभु,  प्रशंसा का कुपथ्य सबमें अजीर्ण पैदा कर देता है, सबको डमरुआ रोग से ग्रसित कर देता है । लेकिन आप इस प्रशंसा को पचाने में बड़े निपुण हैं । अनादिकाल से सारे भक्त आपकी स्तुति कर रहे हैं, पर आपको तो कभी अहंकार हुआ नहीं, ऐसी स्थिति में यह प्रशंसा आपको ही निवेदित है ।

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