गोस्वामीजी से किसी ने पूछा - महाराज ! मनुष्य के जीवन में पाप को मिटाने के लिए सत्कर्म का प्रहार किया जा रहा है, किन्तु फिर भी पाप रक्तबीज की तरह बढ़ता ही जा रहा है, इसके विनाश का उपाय क्या है ? गोस्वामीजी ने कहा - यह कालिका कौन है ? बोले - भगवान की कृपा ही कालिका है । यह एक सूत्र है और इसका सीधा-सा अर्थ यह है कि सत्कर्म करते हुए 'मैं करने वाला हूँ' यह वृत्ति न आने पाये । कर्त्तापन की वृत्ति आने पर रक्तबीज बढ़ेगा । सत्कर्म करते हुए भी अगर यह वृत्ति बनी रहेगी कि भगवान ने ही कृपा करके मुझसे यह कार्य कराया, तब तो रक्तबीज उत्पन्न नहीं होगा । अन्यथा यह बढ़ता ही जायेगा और कभी इसका विनाश नहीं होगा । इसलिए 'अहं' के विनाश की जो प्रक्रिया है, उसका संकेत 'मानस' में कुम्भकर्ण के संदर्भ में किया गया है । कुम्भकर्ण को जगाया गया । कब जगाया गया ? जब रावण की आधी सेना मारी जा चुकी थी । यही अभिमान का मनोविज्ञान है । आधे दुष्कर्म मिट जाते हैं, तब कुम्भकर्ण रूपी अहं को जगाया जाता है । इसका अभिप्राय यह है कि लोभ को मिटाने के लिए दान किया, तो लोभ कुछ घटा, लेकिन उसके साथ ही तुरन्त 'मैं दानी हूँ', यही अभिमान का कुम्भकर्ण जाग उठा । बस ! सत्कर्म के द्वारा आधे पाप के नष्ट होते ही इसके जागने का बड़ा डर है ।
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