....कल से आगे ......
रोग तब होता है, जब रोगी कुपथ्य करता है । नारद ने सारी इन्द्रियों से तो कुपथ्य रोक दिया, पर एक इन्द्रिय से कुपथ्य हो गया । अप्सराओं का सौन्दर्य सामने आया, तो नेत्र से रंचमात्र कुपथ्य नहीं किया, उस पर दृष्टि तक न डाली । वहाँ पर अप्सराओं ने दिव्य सुगंध की सृष्टि की, तो नासिका के द्वारा भी उन्होंने कुपथ्य नहीं किया । जिह्वा के माध्यम से भी नारद किसी वस्तु का कुपथ्य करने वाले थे नहीं । स्पर्श-सुख को त्यागकर त्वचा का भी उन्होंने कुपथ्य नहीं किया । पर एक कुपथ्य से वे बच नहीं पाए । वैसे उससे बच पाना है भी कठिन । वह कुपथ्य श्रवणेन्द्रिय का था । आँख, नाक और जिह्वा से कुपथ्य रोकना सरल है, पर कान का कुपथ्य ऐसा प्रिय लगता है कि बड़े-बड़े त्यागी पुरूष भी इस कुपथ्य से बच नहीं पाते । यह कान का कुपथ्य क्या था ? जब काम जाने लगा तो जाते-जाते एक बात नारदजी के कान में कहता गया और नारदजी ने बड़े प्रेम से उसे भीतर ले लिया । काम कहता गया - महाराज ! विश्व के इतिहास में आपसे बढ़कर कोई महापुरूष हुआ ही नहीं ! बस, त्योहीं प्रशंसा का कुपथ्य नारद के कान में पैठ गया और उनके अन्तःकरण में घास अंकुरित हो गई । चाहे उसे अहंकार की घास कह दीजिए, चाहे मोह की ।
रोग तब होता है, जब रोगी कुपथ्य करता है । नारद ने सारी इन्द्रियों से तो कुपथ्य रोक दिया, पर एक इन्द्रिय से कुपथ्य हो गया । अप्सराओं का सौन्दर्य सामने आया, तो नेत्र से रंचमात्र कुपथ्य नहीं किया, उस पर दृष्टि तक न डाली । वहाँ पर अप्सराओं ने दिव्य सुगंध की सृष्टि की, तो नासिका के द्वारा भी उन्होंने कुपथ्य नहीं किया । जिह्वा के माध्यम से भी नारद किसी वस्तु का कुपथ्य करने वाले थे नहीं । स्पर्श-सुख को त्यागकर त्वचा का भी उन्होंने कुपथ्य नहीं किया । पर एक कुपथ्य से वे बच नहीं पाए । वैसे उससे बच पाना है भी कठिन । वह कुपथ्य श्रवणेन्द्रिय का था । आँख, नाक और जिह्वा से कुपथ्य रोकना सरल है, पर कान का कुपथ्य ऐसा प्रिय लगता है कि बड़े-बड़े त्यागी पुरूष भी इस कुपथ्य से बच नहीं पाते । यह कान का कुपथ्य क्या था ? जब काम जाने लगा तो जाते-जाते एक बात नारदजी के कान में कहता गया और नारदजी ने बड़े प्रेम से उसे भीतर ले लिया । काम कहता गया - महाराज ! विश्व के इतिहास में आपसे बढ़कर कोई महापुरूष हुआ ही नहीं ! बस, त्योहीं प्रशंसा का कुपथ्य नारद के कान में पैठ गया और उनके अन्तःकरण में घास अंकुरित हो गई । चाहे उसे अहंकार की घास कह दीजिए, चाहे मोह की ।
No comments:
Post a Comment