Sunday, 17 April 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

नारदजी के चरित्र में हम देखते हैं कि बीज तो उन्होंने बहुत बढ़िया डाला और खेती हरी-भरी हो गई । पर उन्होंने जो नहीं उपजाना चाहा था, वह भी उपज आया । किन्तु वे उसे काटने की चेष्टा नहीं करते । तब भगवान सोचते हैं कि ये तो इतने निष्क्रिय हो गये हैं कि मुझे ही कटाई - निराई करनी पड़ेगी, भले ही इनको कष्ट हो । यही नारदजी के चरित्र की विडंबना है । पुराणों में उनके अगणित जन्मों का प्रसंग आता है । उन्होंने जीवन को अनेक रूपों में अनुभव किया है और वे अनुभव उनके अर्न्तमन में कहीं न कहीं संस्कार रूप में विद्यमान हैं । हम 'मानस' में पढ़ते हैं कि नारद हिमालय की उपत्यका में जाते हैं और जब वहाँ का वातावरण देखते हैं कि झरना झर रहा है, बड़ी सुन्दर सुशीतल वायु बह रही है, चारों तरफ हरियाली है, तो उन्हें लगता है कि वह भगवान का ध्यान करने के लिए अनुकूल है । वे वहाँ की एक गुफा में बैठकर ध्यान में तल्लीन हो जाते हैं ।
        .......क्रमशः ..... ..

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