'अहं' की समग्रता शिव में ही है । वहाँ न द्वैत है, न कुटिलता और न कपट । वहाँ परपीड़न की वृत्ति नहीं है । क्षुद्र 'अहं' द्वैतसृष्टि करता है और राग-द्वेष, कपटता, कुटिलता, स्वार्थ तथा परपीड़न की वृत्ति को जन्म देता है । उसमें हिंसा और अशांति है, परन्तु शिव परमशान्ति, समाधि, अद्वैत तथा अहिंसा की अवस्था है । शिव मूर्तिमान विश्वास हैं और यह क्षुद्र 'अहं' विश्वास में बाधक है । विश्वास में प्रतिष्ठित होने के लिए यह विराट 'अहं' ही सहायक है । किन्तु यह 'अहं' बिरले ही व्यक्तियों में दिखलायी देता है । हम लोगों में तो किसी न किसी तरह का क्षुद्र 'अहं' ही विद्यमान है । दक्ष को अपने प्रजापतित्व का अभिमान है । हममें से किसी को जाति का, किसी को पद का, किसी को धन का, तो किसी को पुण्य का अभिमान है ।
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