Monday, 18 April 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

......कल से आगे .....
आप जानते होंगे कि नारद को दक्ष प्रजापति ने शाप दिया था कि तुम दो घड़ी से अधिक कहीं नहीं ठहर पाओगे । ब्रह्मा ने दक्ष को सृष्टि का विस्तार करने की आज्ञा दी थी । दक्ष के पुत्र जब कुछ बड़े होते, तब नारद वहाँ पहुँच जाते और उनको ऐसा सत्संग प्रदान करते कि वे लोग घर-बार छोड़कर वन में चले जाते थे । दक्ष ने जब देखा कि यह तो बार-बार मेरी चेष्टा विफल कर रहा है, तब एक दिन बिगड़कर नारद से कहा - तुम लड़कों को बिगाड़ते हो, इसलिए तुम्हारा कहीं पर बहुत देर तक रहना बड़ा घातक है, अतएव मैं तुमको शाप देता हूँ कि तुम अधिक देर तक कहीं नहीं ठहर पाओगे । पर इस शाप से नारद की कोई हानि नहीं हुई, बल्कि लाभ ही हुआ; क्योंकि घूमते रहने से अधिकाधिक लोगों की समस्याओं से उनका परिचय होता गया और वे उनके दुखों को दूर करने में प्रयत्नशील होते रहे । पर आज उनके अन्तःकरण में अन्तर्मुखता की वृत्ति आ गयी और वे बैठकर ध्यान में लीन होता गए ।
    ......क्रमशः ......

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