Tuesday, 5 April 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

वर्णन आता है कि कुम्भकर्ण बंदरों को उठा-उठाकर खाने लगा । समस्त बंदर ही साधन के रूप में सत्कर्म और सद्गुण हैं । सारे सत्कर्म और सद्गुण कुम्भकर्ण के मुँह में समाये जा रहे हैं । क्या हो गया है ? इतने सत्कर्म करने के बाद भी अभिमान पर विजय प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं ! कुम्भकर्ण खाता चला जा रहा है । अंत में संकेत यही है कि सब हार जाते हैं । सुग्रीव को कुम्भकर्ण बगल में दबा लेता है । वे किसी तरह छूटकर भागे और भगवान की शरण में आकर बोले - महाराज ! बड़ी भूल हो गयी, आपको बिना बताये ही हम लड़ने चले गए । यह दुष्ट तो सबको खाये जा रहा है । भगवान बोले - अच्छा, चलो ! बंदर बोले - महाराज ! हम लोग तो जाकर भोग चुके हैं । प्रभु बोले - ठीक है, आगे नहीं तो पीछे चलो, पर चलो तो सही ! गोस्वामीजी ने कहा - भगवान राम आगे बढ़कर कुम्भकर्ण से युद्ध करने लगे । कुम्भकर्ण की दो भुजाएँ हैं, 'मैं' और 'तू' । भगवान उसे काट देते हैं और अंत में उसका शिर भी काट देते हैं । कुम्भकर्ण का तेज निकलकर भगवान में समा जाता है । इसका अर्थ क्या है ? अभिमान जब भगवान से मिल जाय, तब वह क्षुद्र 'अहं' नहीं रह जाता, वह भगवान से एकाकार होकर विराट 'अहं' हो जाता है । तब वही कुम्भकर्ण शिव स्वरूप हो जाता है ।

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