यदि रामकथा को केवल मनोरंजन के रूप में ग्रहण किया जाय तो व्यक्ति को उससे तत्काल आनंद की अनुभूति तो होगी, पर उसके जीवन में समस्याओं का समाधान नहीं होगा । अब ऐसी क्षणिक आनन्द की अनुभूति तो जितने मनोरंजन होते हैं, उन सब में होती है । उतनी देर के लिए व्यक्ति अन्य बातों को भूलकर मनोरंजन में खो जाता है । पर उस मनोरंजन का वास्तविक लाभ तो तब है, जब वहाँ से उठने के बाद भी व्यक्ति अस्वस्थता का अनुभव न कर अपने आपको स्वस्थ अनुभव करे । तो यहाँ पर रामकथा की समाप्ति का जो क्रम है, उसमें मन, बुद्धि और चित्त, इन तीनों के स्तर के लिए है । इस क्रम में पहले यह दर्शाया गया है कि व्यक्ति का मन रुग्ण है, अस्वस्थ है । जब कोई व्यक्ति अस्वस्थ होता है, तो उसके घर में कितनी भी समृद्धि और सुविधा क्यों न हो, उसे चैन नहीं मिलता है, इसी प्रकार व्यक्ति बाह्य दृष्टि से कितना भी उन्नत क्यों न हो, लेकिन यदि वह अन्तर्मन की दृष्टि से अस्वस्थ है, तो किसी प्रकार से सच्ची शान्ति का, सच्ची समाधि का अनुभव नहीं कर सकता । यही कारण है कि गोस्वामीजी यह सोचकर कि कथा की समाप्ति केवल मनोरंजन से न हो जाए, अन्त में मन के रोगों और उनकी चिकित्सा का वर्णन करते हैं, जिससे हम रामकथा को अपने जीवन से जोड़ सकें और उसके माध्यम से अपनी मानसिक अस्वस्थता को, मानसिक रोगों को दूर कर सकें । इस दृष्टि से मानस-रोग का प्रसंग मधुर न होते हुए भी बड़ा प्रेरक है और मनुष्य के अन्तर्मन का बड़ा अच्छा चित्र उपस्थित करता है ।
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