Saturday, 16 April 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

....कल से आगे ......
अब किसी खेत में घास बहुत अधिक मात्रा में उपज जाय तो वह खाद और जल का अपनी बढ़त के लिए उपयोग कर धान की जीवनी शक्ति का ही शोषण कर लेगी । परिणाम यह होगा कि या तो धान उपजेगा ही नहीं या फिर नाम मात्र को उपजेगा, उसकी सारी शक्ति घास को मिल जाएगी । आलसी और निष्क्रिय किसान सोचता है कि कौन इतना श्रम करे, पर चतुर किसान घास को निकालने के लिए डट जाता है । वह अपने इस काम के लिए कोई फावड़ा या बड़ा अस्त्र नहीं लेता । वह तो नन्ही-सी खुरपी लेकर एक-एक पौधे के आस-पास बड़े ध्यान से देखता हुआ घास और धान का भेद करता है तथा घास को काटता चलता है । इसको 'निराना' कहते हैं । भगवान राम कहते हैं कि लक्ष्मण, इसी प्रकार साधक जब अपने जीवन में सत्कर्म की खेती करता है, तब उसकी बगल में पूर्व-पूर्व जन्मों के उसके अन्तःकरण में छिपे हुए संस्कार भी अंकुरित हो जाते हैं । ऐसी परिस्थिति में उसकी सावधानी यह होनी चाहिए कि वह बुरे संस्कारों के पौधों को खुरपी से उसी प्रकार निराते चले, जैसे विद्वान लोग मोह, मद और मान का त्याग कर देते हैं । यह मोह, मद और मान ऐसा है, जिसका बीज इस जन्म में न डालने पर भी वह पूर्व-पूर्व जन्मों के संचित संस्कारों के फलस्वरूप अंकुरित होता रहता है । ऐसी परिस्थिति में सजग रहकर देखना पड़ेगा कि जो धान है, हमारे तो सत्संग के जल से वृद्धिगत हो, पर उसके साथ, उसकी बगल में उगनेवाली घास काट ली जाए ।

No comments:

Post a Comment