Thursday, 21 April 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

तुलसीदासजी से किसी ने पूछ दिया कि स्वर्ग में जाकर मनुष्य तो दुर्गुणों से मुक्त हो जाता होगा ? उत्तर में गोस्वामीजी ने व्यंग्य करते हुए कहा - और दुर्गुण चाहे कम हो जाएँ, पर वहाँ जाकर एक दुर्गुण बढ़ जाता है और वह है ईर्ष्या । वे विनयपत्रिका में लिखते हैं - 'स्वर्गहु मिटइ न सावत' - स्वर्ग में सौतियाडाह नहीं मिटती, ईर्ष्या नहीं मिटती । अब नारद हैं त्यागी और इन्द्र हैंं भोगी । और विचित्रता यह है कि त्याग और भोग दोनों ही पुण्य के फल हैं । पुण्य से व्यक्ति को भोग भी प्राप्त हो सकता है और वैराग्य भी । चुनाव तो व्यक्ति को करना है । देवर्षि नारद तो पुण्य के द्वारा वैराग्य पाने के पक्ष में हैं, पर इन्द्र के मन में भय उत्पन्न होता है कि कहीं ये मेरे स्वर्ग पर अधिकार प्राप्त करने के लिए ही तो तपस्या नहीं कर रहे हैं । इन्द्र अपने माप-दण्ड से नारदजी को नापता है । उसे लगता है कि हमने इतना सत्कर्म करके स्वर्ग प्राप्त किया, नारद भी निश्चय ही स्वर्ग पाने के लिए ही तपस्या कर रहे होंगे । और तब यहाँ पर दुर्गुण के साथ देवता का एक अनोखा समझौता हो जाता है । इन्द्र काम को बुलाकर कहता है - तुम अपने सहायकों सहित जाओ और नारद को ध्यान से विरत करने की चेष्टा करो ।

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