Wednesday, 20 April 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

नारद ने देश, काल और व्यक्तित्व, इन तीनों से मुक्ति प्राप्त कर ली । फलस्वरूप दक्ष प्रजापति ने उन्हे जो शाप दिया था, उसका कोई अर्थ नहीं रहा, क्योंकि वे न तो किसी स्थान में बैठे थे, न किसी काल में थे और न व्यक्तित्व की ही सीमा में थे । वे पूरी तरह दिव्य मनःस्थिति में थे । लेकिन स्वर्ग में बैठे हुए इन्द्र के मन में भय पैदा हो गया कि नारद कहीं स्वर्ग पर अधिकार करने के लिए तो तपस्या नहीं कर रहे हैं । और वह ऐसा सोच उनकी तपस्या भंग करने की चेष्टा में लग जाता है । यहाँ पर गोस्वामीजी एक बड़े महत्व की मनोवैज्ञानिक बात बताते हैं । वैसे लगता तो यही है कि दुर्गुणों की ओर से व्यक्ति के जीवन में बाधा आती है, लेकिन कभी-कभी ऐसा भी दिखाई देता है कि दुर्गुण और सद्गुण मिलकर साधक के जीवन में बाधा की सृष्टि कर रहे हैं । नारद के जीवन में इसी दूसरे तथ्य की ओर संकेत किया गया है । नारद की तपस्या को भंग करने की वृत्ति किसी राक्षस या दैत्य के मन में नहीं आती, वह आती है इन्द्र के मन में । और इन्द्र कौन है ? सबसे बड़ा पुण्यात्मा । सौ अश्वमेध यज्ञ करने वाला ही इन्द्र का पद प्राप्त करता है । तो, ऐसा इन्द्र जो स्वयं सत्कर्म करने वाला है, जब दूसरे को सत्कर्म से विरत करने की चेष्टा करता है, तब यह बात बड़ी अटपटी-सी मालूम पड़ती है । पर यही समाज का सत्य है और जीवन का भी । अच्छे काम में बाधा केवल बुरे लोग ही नहीं डालते, कभी-कभी अच्छे लोग भी डालते हैं । यह तब होता है, जब उनके मन में ईर्ष्या उत्पन्न होती है कि कहीं वह मुझसे बढ़िया काम न कर दे । अच्छा कहलाने वाले ऐसे ईर्ष्यालु व्यक्ति भोगपरायण होते हैं । वे सत्कर्म के बदले कुछ पाना चाहते हैं । उनके मन में यही चिंता रहती है कि बँटवारे में सब मुझे ही मिले, दूसरों को कुछ न मिल पाए ।

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