Friday, 15 April 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

गोस्वामीजी विनयपत्रिका में मोह की बड़ी सुन्दर व्याख्या करते हैं - बड़ा यत्न करने पर भी व्यक्ति मोहजनित मल से छूट नहीं पा रहा है । इस पर पूछा गया कि ऐसा क्यों होता है ? जब अभ्यास कर रहा है, तब तो छूट जाना चाहिए ? इसका उत्तर देते हुए वह कहते हैं - जन्म-जन्म के अभ्यास से हमारे अन्तःकरण में जो संस्कार बीज के रूप में पहले से ही विद्यमान हैं, उनसे यह मल अधिकाधिक लिपटता ही चला जाता है । जैसे हम और आप सत्संग में जाते हैं और कुछ अच्छी बातें सुनते हैं, अच्छे विचार के बीज मन में डालते हैं । ये बीज अन्तःकरण में अच्छे संस्कार के रूप में प्रकट होते हैं । लेकिन इनके साथ ही जन्म-जन्मांतरों के बुरे विचारों के बीज भी वहाँ छिपे हुए हैं और वे भी अवसर मिलते ही अनजाने ही प्रकट हो जाते हैं । धान और घास के पौधे देखने में बिल्कुल एक जैसे हरे-भरे दिखाई पड़ते हैं । इसलिए घास निकालने वाले को यह सावधानी रखनी पड़ती है कि कहीं धान का पौधा न उखड़ जाय और यह भी कि धान की आड़ में कोई घास का पौधा छिपा न रह जाए । अब यह तो बड़ा कठिन कार्य है । मानस में जो 'निराना' शब्द आया है, उसका यही अर्थ होता है । भगवान राम लक्ष्मण से कहते हैं कि साधक यदि सावधान न हो, तो उसके अन्तःकरण में सद् विचारों के बीज के साथ-साथ घास-फूस भी अंकुरित होता जाता है ।
    ......आगे कल .......

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