शरीर में जितने रोग होते हैं, उनके मूल में किसी-न-किसी प्रकार का कुपथ्य होता है । अधिकांशतः व्यक्ति यह जानता है कि मुझे यह भोजन नहीं करना चाहिए, इस समय ऐसा करने से मैं रोगग्रस्त हो जाऊँगा । पर जब व्यक्ति उस ज्ञान का अनादर कर उसके प्रतिकूल आचरण करता है, तो अस्वस्थ हो जाता है । तो, जिस वृत्ति के कारण शरीर में रोग उत्पन्न होता है, वह कुपथ्य है तथा कुपथ्य के मूल में जानते हुए भी विपरीत आचरण करने की जो वृत्ति है, उसका नाम है मोह । इसलिए मोह को 'चित्त का विपर्यय' कहा गया है । यही कारण है कि रामायण में मोह को अज्ञान का प्रतीक या पर्यायवाची नहीं माना गया है । अज्ञान का तो अर्थ है न जानना, पर मोह में ज्ञान के होते हुए भी उसका तिरस्करण है । तो, मोह को समझाने के लिए नारदजी का प्रसंग लिया गया, क्योंकि नारदजी से अधिक जानने वाला, उनसे बढ़कर आध्यात्मिक सत्य को समझनेवाला और कौन हो सकता है ?
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