Friday, 29 April 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

नारद प्रशंसा सुनने की वृत्ति लेकर कैलाश पर्वत पहुंचे । दो महान भक्तों का मिलन हुआ । एक ओर थे देवर्षि नारद और दूसरी ओर थे भगवान शंकर । दोनों ही महान तत्त्वज्ञ और भगवान के परम भक्त थे । यदि उनमें रामकथा छिड़ जाती तो आनन्द बरस पड़ता । लेकिन आज नारद भगवान का चरित्र सुनाने की मुद्रा में नहीं थे । उन्होंने शंकरजी से कहा कि आज तक तो आपको मैं पुरानी कथा सुनाता आ रहा हूँ, पर आज एक नई कथा सुनाने जा रहा हूँ । नारद का संकेत यह है कि भगवान का चरित्र तो वही पुराना है, पर इस बार वे अपना चरित्र सुनाने जा रहे हैं, जिसमें नवीनता है । उन्होंने शंकरजी को सारी घटना सुनाई कि कैसे काम ने उन पर आक्रमण किया और कैसे अप्सराएँ उनके सामने नृत्य करने लगी । इस वर्णन का एक सांकेतिक तात्पर्य है । वह यह कि जब नारद वर्णन करने लगे, तब उनके मानस-नेत्रों के सामने वे दृश्य फिर से आकर खड़े हो गए । इसका अभिप्राय यह है कि बाहर से अप्सरारूप विषयों का त्याग कर देने पर भी अन्तःकरण में संस्कार के रूप में उनका सौंदर्य, उनका नृत्य, उनका आकर्षण बना हुआ है ।

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