मानस में कहा गया है कि काम - क्रोध के मूल में व्यक्ति का मोह विद्यमान है । और मोह ऐसा है, जिसे पैदा करने की कोई चेष्टा नहीं करनी पड़ती । मानस में इसे समझाने के लिए एक सार्थक दृष्टांत दिया गया है । किसान अन्न पैदा करने के लिए खेत को जोतता है, उसमें बीज डालता है और उसकी सिंचाई करता है या आकाश से जल बरसता है । किसान अपनी इस क्रिया के द्वारा खेत से अन्न ही लेना चाहता है, पर उसका प्रतिवर्ष का अनुभव यह बताता है कि वह कितना भी बढ़िया खेत क्यों न जोते और उसमें कितने ही उत्तम बीज क्यों न डाले, अन्न के पौधे उगने के साथ-साथ वहाँ घास के पौधे भी उग आते हैं । अब कोई किसान घास की खेती थोड़े ही करता है ? कोई नहीं चाहता कि मेरे खेत में घास पैदा हो । वह तो धान या गेहूँ ही चाहता है । लेकिन विचित्र बात यह है कि जिस जल के द्वारा वांछित अन्न बढ़ता है, उसी जल के द्वारा उस पृथ्वी में अवांछित घास भी बढ़ती है । अन्न तो किसान ने ऊपर से डाला , फिर घास कहाँ से आ गई ? इसका उत्तर यह है कि घास पहले से ही पृथ्वी में बीज रूप में विद्यमान है । यही स्थिति हमारे-आपके अन्तःकरण की है । कुछ बीज तो ऐसे हैं, जिन्हें हम और आप इस समय अपने अन्तःकरण में डालने की चेष्टा कर रहे हैं । पर कुछ बीज ऐसे हैं, जो पूर्व-पूर्व जन्मों के संस्कार के रूप में विद्यमान हैं ।
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