हम लोगों के यहाँ यह माना जाता है कि जो जैसा भोजन करता है, उसका मन वैसा बन जाता है, इसलिए भोजन को शुध्द होना चाहिए । अब भोजन की शुध्दि के लिए अनेक पध्दतियों का वर्णन किया गया है, लेकिन कितनी भी चेष्टा की जाए, व्यक्ति यह कैसे दावा कर सकता है कि वह जो कुछ खा रहा है, वह शुध्द ही है ? ऐसी स्थिति में हमारे यहाँ के भक्तों ने जिस मार्ग का मार्ग का अनुगमन किया, वह बड़ा कल्याणकारी है । भक्त को जब अन्न दिया जाता है, तब वह पहले भगवान को भोग लगाता है और तत्पश्चात दूसरों को प्रसाद बाँटकर स्वयं खाता है । तो, सामान्य भोजन को तो बहुत से लोग भोग लगाकर ग्रहण करते हैं, पर प्रशंसा के भोजन का भोग लगाना भूल जाते हैंं । प्रशंसा का व्यंजन ऐसा होता है, जो व्यक्ति के जीवन में अहंकार की सृष्टि करता है । हम जब भी अपनी प्रशंसा सुनेंगे, अहंकार होने का भय बना ही रहेगा । ऐसा हो नहीं सकता कि कोई हमारी प्रशंसा करे ही न । किसी को प्रशंसा करने से रोका नहीं जा सकता । ऐसी स्थिति में उपाय क्या है ? - यही कि उस प्रशंसा को भगवान को समर्पित कर दिया जाय और उसे बाँट दिया जाए । जब भी कानों में प्रशंसा आवे, उसे तुरन्त भगवान को निवेदित कर दें । नारद ने भी ऐसा किया, लेकिन बहुत देर बाद । नियम यह है कि पहले भोग लगा लें, तब भोजन करें । पर नारदजी पहले भोजन कर लेते हैं और बाद में जब थोड़ी सी जूठन बच रहती है, तब भगवान को भोग लगाते हैं । वे क्रम को उलट देते हैं ।
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