रामकथा में अनेक गुण विद्यमान हैं । पर वस्तुतः रामकथा का उद्देश्य क्या है ? वैसे तो मनोरंजन की दृष्टि से भी रामकथा कही और सुनी जाती है । अगर अन्य मनोरंजनों के स्थान पर हम रामकथा से मनोरंजन प्राप्त करते हैं, तो यह कोई निन्दा की बात नहीं, प्रशंसा की बात है । गोस्वामीजी स्वयं स्वीकार करते हैं कि एक विषयी व्यक्ति जब रामकथा को सुनता है, तो उसके कानों को वह बड़ी प्रिय लगती है, उसके मन को सुख प्राप्त होता है । लेकिन रामकथा का उद्देश्य केवल मन तक ही सीमित नहीं है । उसे हम यों कह सकते हैं कि सुनने के मुख्य रूप से तीन माध्यम हैं - मन, बुद्धि और चित्त । फिर संसार में व्यक्ति भी तीन प्रकार के होते हैं - विषयी, साधक और सिद्ध । विषयी मुख्य रूप से मन के माध्यम से सुनता है । पर साधक केवल मन का ही प्रयोग नहीं करता, अपितु उसके साथ-साथ अपनी बुद्धि के माध्यम से रामकथा को ग्रहण करता है । और जो सिद्ध व्यक्ति है, उसके लिए रामकथा केवल मन और बुद्धि का विषय नहीं है, वह तो चित्त से रामकथा के साथ एकाकार होकर, तन्मय होकर, तदाकार होकर साक्षात कथा का ही रूप बन जाता है । इस तरह कह सकते हैं कि रामकथा विषयी, साधक और सिद्ध के लिए क्रमशः उत्कृष्ट से उत्कृष्टतम रूप में सामने आती है ।
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