Monday, 25 April 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

रामायण में जो चतुर पात्र हैं, उनको यदि प्रशंसा परोसी जाए, तो वे तुरंत भगवान को परोस देते हैं । चित्रकुट में भगवान ने भरतजी के सामने प्रशंसा की लम्बी थाल परोस दी । लेकिन भरतजी ने भगवान को उसका भोग लगा दिया । भगवान ने पूछा, 'भरत, यह बताओ मैं जो कह रहा हूँ, वह ठीक है या नहीं ? मेरी दृष्टि पर तुम्हें विश्वास है या नहीं ?' भरतजी बोले, 'प्रभु, मैं आपकी दृष्टि पर विश्वास कैसे न करूँ ? जब आप कह रहे हैं, अवश्य होगा ।' भगवान बोले, 'अब तो अपनी निन्दा नहीं करोगे ? अपने को पापी नहीं कहोगे ?' भरतजी ने कहा, नहीं महाराज, मैं जानता हूँ, आपके सामने एक समस्या है, यह कि दोष तो आप देख ही नहीं पाते । इसलिए मेरे दोष आपको दिखाई नहीं देते हैं तो ठीक ही है । भगवान ने पूछा, अच्छा, दोष देखना यदि मुझे नहीं आता तो गुण देखना तो आता है ?
      .....आगे कल ......

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