Tuesday, 31 May 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

रुद्रगणों की भूल यह थी कि वे नारद को हँसी का पात्र बना रहे थे । नारदजी का उपहास देखकर उन्हें आनन्द की अनुभूति हो रही थी । परिणाम यह होता है कि नारदजी का क्रोध अनियंत्रित हो गया । फलस्वरूप उन्हें ध्यान नहीं रह गया कि मैं क्या कर रहा हूँ । उन्होंने शिवगणों को राक्षस बना दिया । उनके क्रोध ने रावण और कुम्भकर्ण की सृष्टि कर दी । वह तो अच्छा हुआ कि उतने पर ही उनका क्रोध शान्त नहीं हुआ, नहीं तो भगवान उनकी चिकित्सा कैसे करते ? नारदजी का क्रोध सीमा का अतिक्रमण कर गया । भगवान तो थे नहीं, पर क्रोध में उनके होंठ फड़कने लगे, मानो तैयारी करने लगे कि चलकर क्या करना है - क्रोध की तीव्रता इतनी थी कि सोचने लगे - या तो मैं आत्महत्या कर लूँगा, या फिर भगवान को शाप दूँगा । मुझे उन्होंने संसार में हँसी का पात्र बना दिया ।

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