गोस्वामीजी दोहावली रामायण में कहते हैं कि एक तो जहाँ ममता हो वहाँ से मन को हटा लेना चाहिए और ऐसा न हो सके तो क्या उपाय है - या तो ममता राम पर करो या ममता का त्याग करो । तात्पर्य यह है कि ममता अगर ससीम पर होगी तो उसके खण्डित होने पर वह दुख देगी । भले ही वह प्रारंभ में सुख दे, पर बाद में दुख दिए बिना नहीं रहेगी । लेकिन यदि हमारा ममता का केन्द्र नित्य होगा, अखण्ड होगा, तो वह हमारे जीवन में केवल सुख की सृष्टि करेगी, दुख की कभी नहीं । इसलिए श्रीलक्ष्मण परशुरामजी से कहते हैं - 'एहि धनु' - उनका यह शब्द बड़े महत्व का है । कहते हैं - महाराज, यह धनुष तो आप देख ही रहे हैं, टूटा हुआ पड़ा है । इसका अर्थ तो यही हुआ कि आपने अपने मन में यह मान लिया था कि यह धनुष कभी नहीं टूटेगा, कभी नहीं मिटेगा । यह आपकी भ्रांति थी । कोई वस्तु बहुत दिनों तक टिकती है तो कोई जल्दी नष्ट हो जाती है । यह काल तो सत्य है । और लक्ष्मणजी कौन हैं ? ये तो स्वयं काल हैं और वैराग्य ही इनकी भूमिका है । काल के सत्य पर दृष्टि जाते ही वैराग्य का उदय होता है और वैराग्य से ही ममता की निवृत्ति होती है । इस प्रकार भगवान राम ने अखण्ड-ज्ञान के रूप में परशुरामजी को अहंता से निवृत्त किया और कालरूप लक्ष्मणजी ने वैराग्य की भूमिका द्वारा उन्हें ममता से मुक्त होने की प्रेरणा दी ।
Friday, 30 September 2016
Thursday, 29 September 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
लक्ष्मणजी द्वारा परशुरामजी को कहे गये एक-एक शब्द बड़े सार्थक हैं । एहि, धनु, ममता, केहि हेतू - इन चार शब्दों की अर्थ-गरिमा पर विचार करें । लक्ष्मणजी कहते हैं - महाराज ! पहली बात तो यह है कि ज्ञान की दृष्टि से तो आपमें ममता होनी ही नहीं चाहिए । और अगर यह मान भी लिया जाय कि व्यवहार की दृष्टि से कुछ-न-कुछ ममता तो रखनी ही पड़ती है, तो वह अधिकार भी आपको नहीं है । क्योकि न तो आपने विवाह किया, न गृहस्थ हुए और न सत्ता ही स्वीकार की । आप तो बाल-ब्रह्मचारी, सर्वत्यागी महात्मा हैं । जिस व्यक्ति के जीवन में इतना त्याग हो उसमें ममता का न होना ही स्वाभाविक लगता है और आपके चरित्र के लिए भी यह अनुकूल होता । लेकिन यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि इतना त्याग करने के बाद भी आपने अपने जीवन में ममता को रहने दिया । फिर वे व्यंग्य करते हुए बोले - और आपने ममता रखी भी तो किस पर ? 'एहि धनु पर' इस धनुष पर ? तो ममता के लिए क्या यह धनुष ही बचा था ? आप देख ही रहे हैं कि यह टूटा हुआ पड़ा है, खण्डित है अर्थात यह परिणामी, ससीम और अनित्य है । एक तो ममता होनी ही नहीं चाहिए थी और यदि आपको ममता जोड़नी ही थी तो आपके सामने खण्ड और अखण्ड दोनों थे । एक ओर तो खण्डित धनुष पड़ा है और दूसरी ओर अखण्ड ज्ञानघन श्रीराम खड़े हैं । लक्ष्मणजी का तात्पर्य यह था कि ममता करनी ही थी तो किस पर की जाय इसका विवेकपूर्ण चुनाव तो कर लेना था ।
Wednesday, 28 September 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
परशुरामजी क्रोध से भरे हुए हैं । लक्ष्मणजी सामने आते हैं । और ऐसा बढ़िया निदान करते हैं कि रोग सीधे पकड़ में आ जाता है । इस बात पर न जाएँ कि कौन किस जाति का है । कई लोग तो यह कहने लगते हैं कि लक्ष्मणजी इतनी छोटी अवस्था के थे और परशुरामजी इतने वयोवृद्ध, लक्ष्मणजी को उनसे ऐसा नहीं बोलना चाहिए था । यहाँ अवस्था नहीं विचार की दृष्टि से देखिए । परशुरामजी क्रोध से भरे हुए हैं । लक्ष्मणजी पूछते हैं - आपको क्रोध क्यों आ रहा है ? तब वे कहते हैं - मेरे गुरुदेव का धनुष टूट गया, इसका मुझे बड़ा दुख है । लक्ष्मणजी ने कहा - नहीं महाराज, आपके दुख का कारण यह नहीं है । क्यों ? क्योंकि विश्व के इतिहास में क्या पहली बार धनुष टूटा है ? बचपन में जब हम श्रीराघवेन्द्र सहित चारों भाई खेला करते थे, तो रोज कोई-न-कोई धनुष तोड़ते ही रहते थे, पर आप तो कभी यह कहने नहीं आए कि धनुष क्यों तोड़ा ? वह भी तो धनुष ही था । उसका टूटना क्या टूटना नहीं था ? यह जीवन का एक महत्वपूर्ण सत्य है । हम मृत्यु पर दुखी होते हैं । पर मृत्यु तो सारे संसार में हर समय किसी-न-किसी की होती रहती है । पर क्या हम प्रत्येक व्यक्ति की मृत्यु पर दुखी होते हैं ? अगर होते भी हैं तो केवल व्यवहार की दृष्टि से दिखावे भर के लिए ही । लक्ष्मणजी स्पष्ट कह देते हैं - बचपन में हमने कितने ही धनुष तोड़े, पर कभी आपको क्रोध नहीं आया । इस धनुष के प्रति आपकी ममता का क्या कारण है ? उनका अभिप्राय यह था - महाराज, वस्तुतः आपको दुख यह धनुष नहीं, आपकी ममता दे रही है ।
Tuesday, 27 September 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
परशुरामजी को पराजय की अनुभूति क्यों नहीं हुई ? हम स्वयं से थोड़े ही हारते हैं । जब कोई दूसरा हमें हरा देता है तब हमें हार की अनुभूति होती है । एक बड़ा प्रसिद्ध वाक्य है - अन्यत्रं जयमिच्छेत पुत्रादिच्छेत्पराजयम् - दूसरों से जीतने की इच्छा रखे, पर अपने पुत्र से हार जाय तो बड़ी प्रसन्नता होती है । पुत्र अगर पिता की अपेक्षा अधिक पढ़ ले, अधिक ज्ञान प्राप्त कर ले, तो पिता को बड़ा सन्तोष होता है । क्यों होता है ? अपनत्व के कारण । परायेपन की अनुभूति रही, तो वहाँ भी हार का बोध होगा और विद्वेष उत्पन्न होगा । परशुरामजी का व्यक्तित्व जिस अहं से उबर नहीं पा रहा था, उसे भगवान राम ने उबारा । और ममता ? वह भी उसी अहं से जुड़ी हुई थी, जिससे उबारा लक्ष्मणजी ने ।
Monday, 26 September 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
परशुरामजी को जब राम का प्रभाव ज्ञात हुआ, प्रेम मानो ह्रदय में अँट नहीं रहा था और तब परशुरामजी के मुख से पहला शब्द क्या निकला ? जय रघुवंश ! सुनने वाले तो चौंक पड़े ? सर्वथा भृगुवंश की जय बोलने वाले आज रघुवंश की जय कैसे बोलने लगे ? परशुरामजी ने कहा - अब मैं समझ गया हूँ । पहले मैं समझता था कि मेरी विजय में - भृगुवंश की विजय में - ब्राह्मण की विजय में क्षत्रिय जाति की हार है । पर राम की विजय में सबकी विजय है, पराजय किसी की नहीं, यही उसकी विशेषता है । यह बड़े महत्व की बात है । जिस जीत में किसी की हार होगी, उसमें जीतने वाले को अहंकार होगा और हारने वाला बदला लेने की तैयारी करेगा
। लेकिन जिनकी जीत में सबकी जीत है, उनके लिए परशुरामजी ने नौ बार जय जय कहकर स्तुति की - आरंभ किया जय से और अन्त भी किया जय से । इस प्रकार उन्होंने नौ बार जय शब्द का प्रयोग किया । अभिप्राय यह है कि भगवान राम ने परशुरामजी से कहा था कि मैं तो आपसे हर प्रकार छोटा हूँ । मुझमें तो केवल एक गुण है और आप में तो ब्राह्मण होने के नाते नौ गुण विद्यमान हैं । इसलिए परशुरामजी ने नौ बार जय शब्द का प्रयोग करके कहा - हे राम ! ये नौ गुण मैं आपको ही अर्पित करता हूँ । अब मैंने समझ लिया कि इनका कोई महत्व नहीं और न अब इनकी आवश्यकता ही है । इस तरह परशुरामजी ने अहं के द्वारा अपने व्यक्तित्व को जो ससीम बना लिया था, वह अब असीम से मिलकर एकाकार हो गया ।
। लेकिन जिनकी जीत में सबकी जीत है, उनके लिए परशुरामजी ने नौ बार जय जय कहकर स्तुति की - आरंभ किया जय से और अन्त भी किया जय से । इस प्रकार उन्होंने नौ बार जय शब्द का प्रयोग किया । अभिप्राय यह है कि भगवान राम ने परशुरामजी से कहा था कि मैं तो आपसे हर प्रकार छोटा हूँ । मुझमें तो केवल एक गुण है और आप में तो ब्राह्मण होने के नाते नौ गुण विद्यमान हैं । इसलिए परशुरामजी ने नौ बार जय शब्द का प्रयोग करके कहा - हे राम ! ये नौ गुण मैं आपको ही अर्पित करता हूँ । अब मैंने समझ लिया कि इनका कोई महत्व नहीं और न अब इनकी आवश्यकता ही है । इस तरह परशुरामजी ने अहं के द्वारा अपने व्यक्तित्व को जो ससीम बना लिया था, वह अब असीम से मिलकर एकाकार हो गया ।
Sunday, 25 September 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
भगवान राम न तो जाति की सीमा में आबद्ध थे और न अहं की । उन्होंने परशुरामजी से पूछ लिया - आप क्या चाहते हैं ? परशुरामजी ने कहा - तुम मुझसे युद्ध करो । क्यों ? महाराज ! युद्ध से क्या होगा ? यही न कि जो सबल होगा वह जीतेगा और दूसरा हारेगा । भगवान राम ने पूछा - तो आप युद्ध में विजय ही तो चाहते हैं । पर इसके लिए युद्ध की क्या आवश्यकता - हम तो सब प्रकार से आपसे हारे हुए हैं, आप हमारे अपराधों को क्षमा करें । हे नाथ ! हमारी और आपकी बराबरी कैसे ? कहाँ तो मेरा छोटा-सा 'राम' मात्र नाम और कहाँ आपका परशु सहित बड़ा नाम ? हे देव ! हमारे धनुष में तो बस एक ही डोरी है और आपके परम पवित्र धनुष में नौ डोरियाँ हैं । बड़ी अनोखी बात है, बड़ा बनने की चेष्टा करने वाला छोटा बन गया और छोटा बनने वाला बड़ा । परशुराम कहते हैं - मैं बड़ा हूँ और राम कहते हैं - मैं छोटा हूँ । लेकिन बात उलट गई । बाद में परशुरामजी हाथ जोड़कर श्रीराम की स्तुति करने लगे । उनका वर्णाभिमान मिटा होगा, तभी तो उन्होंने स्तुति की होगी । जाति-वर्ण की सीमा टूट गई । पूर्ण के सामने अपूर्णता दूर हो गई ।
Saturday, 24 September 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
परशुरामजी ने अपने आपको एक सीमा में बाँध लिया था, जिससे उनके जीवन में टकराहट की समस्या थी । कहाँ तो वे एक ओर साक्षात ईश्वर के अंश आवेशावतार हैं और कहाँ उन्होंने अपने आपको एक सीमा में बाँध लिया । और वह सीमा भी उनकी अपनी ही बनाई हुई है । क्षत्रिय जाति ने अन्याय किया और उन्होंने दण्ड दिया । वे कह सकते थे कि मैं क्षत्रिय जाति का कल्याण करने वाला हूँ, मैं उन्हें सही रास्ते पर ले जाने वाला हूँ । परन्तु उन्होंने ब्राह्मण के रूप में एक तीव्र संस्कार पाल लिया और भगवान राम को भी अपना परिचय देने लगे कि मैं कोई साधारण ब्राह्मण नहीं, मैं बालब्रह्मचारी हूँ और अति क्रोधी हूँ । इतना ही नहीं यह भी अच्छी तरह समझ लो कि मैं क्षत्रिय कुल का विश्वविख्यात शत्रु हूँ, उसे मिटा देने वाला हूँ और तुम दोनों क्षत्रिय हो । अगर भगवान राम भी परशुराम की तरह अपने आपको किसी जाति की सीमा लें और यह कहें कि अगर आप ब्राह्मण हैं तो मैं भी क्षत्रिय हूँ, चलिए हो जाय हमारा युद्ध । लेकिन भगवान राम के जीवन में क्या दिखाई देता है ? वहाँ न जाति की सीमा है और न संकीर्णता । वहाँ तो परिपूर्णता है । सांसारिक व्यवहार की दृष्टि से भगवान राम ने क्षत्रिय जाति में जन्म लिया था । परशुरामजी ने अब तक कई बार क्षत्रिय जाति को दण्डित किया है । भगवान राम कह सकते थे कि क्षत्रिय के रूप में मैं उसका बदला लूँगा । मैं भी आपको दण्ड दूँगा । लेकिन अगर ऐसा होता तो तो फिर एक अहं की दूसरे से टकराहट हो जाती ।
Friday, 23 September 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
श्रीराम सबको यहाँ तक कि रावण, कुम्भकर्ण को भी राम बना देते हैं । जब कुम्भकर्ण भगवान राम के सामने आ खड़ा होता है तो देवताओं को लगता है कि बस अब इस दुष्ट का वध हुआ ही समझो, पर अगले ही क्षण जो दृश्य दिखाई दिया, उससे वे चौंक पड़े । क्या देखा, उन्होंने ? जैसे ही कुम्भकर्ण का सिर कटा, उसका तेज निकलकर भगवान श्रीराम के मुँह में समा गया । देवताओं ने चकित होकर देखा कि अब तो कुम्भकर्ण भी राम बन गया । राम से मिलकर राम हो गया । देवताओं और मुनियों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि हम लोग महान साधना के द्वारा जिस एकत्व पर विचार करते हैं, उस एकत्व की यहाँ प्रत्यक्ष अनुभूति हो रही है । अभिप्राय यह है कि जहाँ पर अभिमान समाप्त हो जाता है वहाँ पर समत्व की - कि सब राम हैं - यही वृत्ति रह जाती है । क्योकि अभिमान के लिए दो चाहिए और दो में भी एक छोटा और एक बड़ा । अभिमान बराबरी में नहीं होता । यही परशुरामजी की वृत्ति है । उनको दो दिखाई दे रहा है और दो में भी उनकी इच्छा यह हो रही है कि हमारी बराबरी का कोई अन्य न रहे । दूसरा रहे भी तो, कोई अन्य नाम रख ले, बहुत नाम हैं । यह अहं उनकी एक समस्या है, जो सत्कर्म से घटा नहीं बल्कि बढ़ा है । उन्होंने अपने आपको एक सीमा में संकुचित कर लिया है ।
Thursday, 22 September 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
भगवान राम और लक्ष्मण से परशुरामजी के संवाद का क्या तात्पर्य है ? वस्तुतः यह दो समस्याओं और दो समाधानों के बीच संवाद है । परशुरामजी की अहंता को दूर किया श्रीराम ने और ममता को दूर किया लक्ष्मणजी ने और यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है । भगवान राम हैं ज्ञानघन और अहंकार होता है अज्ञान से । लक्ष्मणजी वैराग्यमूर्ति और ममता होती है आसक्ति से । मनुष्य के जीवन में जब अहंकार की वृत्ति आती है तब वह अपने को बहुत बड़ा समझने लगता है । कई बार तो हम अहंकार की वृत्ति यह सोचकर स्वीकार कर लेते हैं कि इससे हम बड़े हो जायेंगे । परन्तु अहंकार के द्वारा व्यक्ति बड़ा नहीं, सिमट कर छोटा हो जाता है । क्यों ? अहं के लिए वह अपने आपको किसी-न-किसी सीमा में आबद्ध कर लेता है । चाहे वह देश की हो या जाति की या धर्म की, वह एक सीमा में सिमट जाता है । दोनों राम खड़े हैं । दोनों में क्या अन्तर दिखाई दे रहा है ? परशुरामजी भगवान राम से कहते हैं कि तुम मुझसे युद्ध करो और भगवान राम उनसे विनम्रतापूर्वक पूछते हैं कि यदि मैं आपसे युद्ध न करना चाहूँ तो क्या कोई और विकल्प नहीं है ? उन्होने कहा - एक विकल्प है । क्या ? यह जो तुम्हारा नाम 'राम' रखा गया है, इसे तुम छोड़ दो । आज से राम कहलाना बन्द कर दो । राम केवल मैं रहूँगा, दूसरा कोई नहीं रहेगा । इन दोनों रामों में क्या अन्तर है ? राम और परशुराम में अन्तर यह है कि श्रीराम जब राक्षसों को मारते हैं, तो उन्हें भी राम बना देते हैं । जो सारे संसार को राम बना दे वह पूर्ण है और जो यह कहे कि मुझे छोड़कर कोई दूसरा राम न रहने पाए, वह अपूर्ण है ।
Wednesday, 21 September 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
भक्ति के संदर्भ में परशुरामजी के चरित्र से हमें काफी प्रेरणा मिल सकती है । परशुरामजी ने ब्रह्मचर्य के द्वारा काम को जीत लिया था और दान के द्वारा लोभ को जीत लिया था । वे महान तपस्वी, महान शास्त्रवेत्ता, महान पितृभक्त और सद्गुणों के पुंज थे । पर इतना सब होते हुए भी परशुरामजी के जीवन में शान्ति क्यों नहीं थी ? जो लोग दुष्कर्म करके दुखी हैं, उनकी बात समझ में आती है कि पाप करने पर व्यक्ति दुख पा रहा है, लेकिन अगर किसी को सत्कर्म करते हुए भी शान्ति नहीं मिल रही है, तो इसका मतलब क्या है ? परशुरामजी के जीवन में तो सत्कर्मों की पराकाष्ठा दीख पड़ती है । उन्होंने कोई छोटा-मोटा दान नहीं, पूरी पृथ्वी का दान किया था । उनका ब्रह्मचर्य भी साधारण नहीं था, वे आजन्म ब्रह्मचारी रहे । पर इतना होते हुए भी परशुरामजी को शान्ति नहीं मिली । इस महान प्रसंग की उपलब्धि यह है कि परशुरामजी को अन्ततः शान्ति मिल जाती है । उनके जीवन से हमें शान्ति का मार्ग दिखाई देता है । उनके जीवन में अशान्ति का मूल कारण क्या था ? यदि हम इस पर विचार करके देखें तो वहाँ हमें दो ही ऐसे कारण दिखाई देंगे जो परशुरामजी को दुखी और अशान्त बनाए हुए हैं । हम चाहे कितना भी सत्कर्म क्यों न करें पर जब तक ये दोनों हमारे जीवन में विद्यमान रहेंगे, तब तक हमें शान्ति नहीं मिल सकती । परशुरामजी के अन्तःकरण में ये दो भाई हैं - अहंता और ममता और उनके सामने दो भाई खड़े हैं - श्रीराम और लक्ष्मण, ये ही उन्हें सुख और शान्ति प्रदान करने वाले हैं । अहंता का समाधान है श्रीराम और ममता का श्रीलक्ष्मण । ये अहंता और ममता अर्थात मैं और मेरापन - एक दूसरे से जुड़े हुए हैं । जब तक यह अहंता और ममता नहीं मिट जाती, तब तक जीवन में सुख और शान्ति नहीं आ सकती । यही अहंता और ममता ही परशुरामजी की समस्या है ।
Tuesday, 20 September 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
परशुरामजी द्वारा श्रीराम को न पहचान पाने का तात्पर्य क्या है ? श्रीराम भी ईश्वर के अवतार हैं और परशुरामजी भी । वैसे विचार करके देखें तो वेदांत की दृष्टि से प्रत्येक जीव ईश्वर का ही अंश है, अतः उसमें ईश्वर के लक्षण भी विद्यमान हैं और जीव के भी । जीव अपूर्ण है और वह अपूर्णता क्या है ? अज्ञान ! जीव की अपूर्णता अभावजन्य नहीं, अज्ञानजन्य है । परशुरामजी की समस्या क्या है ? वे अशान्त क्यों हैं, दुखी क्यों हैं ? विवाद क्यों करते हैं ? - अज्ञान के कारण और उनकी सारी समस्याओं का समाधान कब हुआ ? 'जाना राम प्रभाव तब' - जान लेने पर । परशुरामजी ने श्रीराम को पहचान लिया । उनका क्रोध शान्त हो गया और ग्लानि दूर हो गई । गोस्वामीजी ने अपनी शैली में लिखा - 'राम से राम बोले' यह कहकर गोस्वामीजी यहाँ यह बताना चाहते थे कि यह प्रकाश और अन्धकार के बीच की बात नहीं है, यह प्रकाश और प्रकाश के बीच की बात है । झगड़ा समाप्त हो गया । न कोई युद्ध हुआ और न शस्त्र चले । केवल जान लेने से ही सारा झगड़ा समाप्त हो गया । अब वे राम के स्वरूप को पहचान गये थे, उनकी परिपूर्णता को जान गये थे । दोनों के बीच जो दूरी थी, वह मिट गई । अभिप्राय यह है कि जब तक स्वरूप की विस्मृति है, तभी तक टकराहट है । जब स्वरूप की स्मृति हो जाती है, स्वरूप का ज्ञान हो जाता है, तब जैसे कोई स्वयं से नहीं लड़ता, उसी प्रकार राम से राम का न लड़ना स्वाभाविक है । यह हुआ ज्ञान के सन्दर्भ में ।
Monday, 19 September 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
वस्तुतः लक्ष्मण-परशुराम संवाद की विशेषता यह है कि बाहर से चाहे जितना विनोद-भरा दिखाई दे, पर भीतर से वह उतना ही गम्भीर है । ज्ञान, भक्ति और कर्म के संदर्भ में यह प्रसंग अत्यंत गूढ़ तत्त्वों से भरा हुआ है । अगर ज्ञान की दृष्टि से देखें तो परशुरामजी का यह प्रसंग स्वरूपविस्मृति का प्रसंग है । वेदांत की मान्यता यह है कि सारा दुख अपने आपको न जानने के कारण है । वेदांत की मान्यता यह है कि व्यक्ति के अत्यंत निकट जो आनन्द का केन्द्र है, सुख का केन्द्र है, उसे न जानने के कारण ही वह दुखी है । अगर वह केन्द्र न होता और व्यक्ति उसके अभाव में दुखी होता, तब तो लगता कि सचमुच इसके जीवन में सुख का अभाव है ? पर अन्तर में सुख का कोष होते हुए भी वह दुखी है, इसका अभिप्राय क्या है ? वह अभाव के कारण दुखी नहीं, बल्कि अज्ञान के कारण दुखी है । इसे ही गोस्वामीजी विनयपत्रिका में कहते हैं कि जो अभावजन्य दुख है, वह तो वस्तु से ही दूर होगा, पर अज्ञानजन्य दुख वस्तु से नहीं, जानने से दूर होगा । गोस्वामीजी दृष्टांत देते हैं कि व्यक्ति पलंग पर सोया हुआ स्वप्न देख रहा था कि वह समुद्र में डूब रहा है और वह जोर-जोर से चिल्ला रहा है, मैं डूब रहा हूँ, बचाओ, बचाओ । सुनकर एक सज्जन कमरे से भागे । किसी ने पूछा, कहाँ जा रहे हो ? उन्होंने कहा, नाव लाने । उसने कहा, एक-दो नहीं, करोड़ों नावें लाकर भी आप उसके पलंग के चारों ओर लगा दोगे तो भी क्या लाभ ? उसे बचाने का तो एक ही उपाय है कि आप उसे जगा दें । यही वेदान्त की मान्यता है कि सारा दुख अज्ञानजन्य है, अभावजन्य नहीं । यहाँ परशुरामजी के प्रसंग में भी वेदांत की दृष्टि से बड़ी सांकेतिक बात कही गयी है । राम को ही नहीं पहचान पा रहे हैं ?
Sunday, 18 September 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
रामचरितमानस में विभिन्न प्रसंगों में ममता की विभिन्न रूपों की व्याख्या की गयी है । गोस्वामीजी ज्ञान, भक्ति और कर्म - तीनों के सन्दर्भ में ममता का स्वरूप स्पष्ट करते हुए इसकी बड़ी मनोवैज्ञानिक व्याख्या करते हैं । ज्ञानी के जीवन में तो ममता सर्वथा त्याज्य है ही, भक्त के जीवन में भी ममता ईश्वर समर्पित हो जाती है और कर्मयोगी को भी अपने जीवन में इसे धीरे-धीरे समेटना चाहिए । इस तरह ज्ञान, भक्ति और कर्म तीनों के सन्दर्भ में ममता की चर्चा की गयी है और उसकी विविध वृत्तियों की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया गया है । रामायण में एक ऐसा प्रसंग है, जिसे लोग बड़े आनन्द से पढ़ते या सुनते हैं । परन्तु जिस सन्दर्भ में उसे पढ़ा या सुना जाता है, वही उसका भाव नहीं है । वह एक बड़ा ही रोचक प्रसंग है । विशेषकर जब कहीं रामलीला चल रही हो तो उसमें अन्य लीलाएं तो कुछ घण्टों में समाप्त हो जाती हैं, पर जब लक्ष्मण-परशुराम संवाद प्रारंभ होता है, तो वह रात-भर चलता रहता है । रामायण में जितना है, उससे भी बहुत आगे बढ़कर वह संवाद होता है और दर्शक तथा श्रोता इस संवाद में बड़ा आनन्द लेते हैं । लेकिन उनके आनन्द लेने की वृत्ति जिस स्तर की है और उसे जिस स्तर पर प्रस्तुत किया जाता है, उसे बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता । इसलिए एक सन्त ने अपने आश्रम में चल रही रामलीला में लक्ष्मण-परशुराम संवाद के दिन उमड़ी भीड़ को देखकर प्रसन्न होने के स्थान पर दुख प्रकट करते हुए कहा कि इससे पता चलता है कि रामलीला में भी लोग झगड़ा देखना ही पसन्द करते हैं । शान्ति की बातें पसन्द नहीं करते । जिसमें समत्व हो, शान्ति हो, भक्ति हो, वैराग्य हो ; उसमें उतना रस नहीं आता, जितना कि तू-तू मैं-मैं में आता है । साधारण दृष्टि से देखें तो लक्ष्मण-परशुराम संवाद का प्रसंग तू-तू मैं-मैं का प्रसंग प्रतीत होता है । और उसमें व्यक्ति को ऐसा कुछ सन्तोष मिलता है कि चलो रामायण में भी कुछ ऐसे पात्र हैं, जो हम लोगों की तरह तू-तू मैं-मैं करते हैं । और इससे ह्रदय में ऐसी वृत्ति आती है कि इतने महान पात्र भी जब ऐसा कर सकते हैं, तो हम भी ऐसा करके कोई गलत काम नहीं करते । इसको अलग-अलग देखनेवाले अलग-अलग रूपों में देखते हैं ।
Saturday, 17 September 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
गोस्वामीजी ने एक प्रसंग में तो ममता को मन का दाद कहा, पर अन्यत्र एक प्रसंग में ममता की तुलना धागे से की - माता, पिता, भाई, पुत्र, पत्नी, शरीर, धन, गृह, मित्र और संबंधी - इन सबके प्रेमरूपी धागों को एकत्र कर डोरी बना ले । यहाँ पर ममता को धागा कहा गया । धागा बन्धन का हेतु है । लेकिन एक तीसरे प्रसंग में तो बड़ी मनोवैज्ञानिक बात कही गयी है - "ममता तरुन तमी अँधियारी" - ममता अँधेरी रात है । अमावस्या की गहरी रात में कुछ भी दिखाई नहीं देता । पर ममता के लिए इस उपमा की क्या सार्थकता है ? ऐसा तो नहीं लगता कि ममता होने पर दिखाई न देता हो । तब गोस्वामीजी व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि यह कब कहा कि अँधेरी रात में दिखाई नहीं देता । पर हाँ, सबको दिखाई नहीं देता । जिसे दिखाई देता है, वह उल्लू को छोड़ और कौन होगा ? किसी के मन में ममता हो और वह यदि कहे कि मुझे दिखाई दे रहा है तो समझ लेना कि वह कौन है ? जैसे सामान्यतः देखने के लिए व्यक्ति की दो आँखें होती हैं, उसी तरह ममता की अँधेरी रात में देखने वाले ये उल्लू भी दो हैं । ये दो उल्लू कौन हैं - "राग द्वेष उलूक सुखकारी" - ममता घनी अँधेरी रात है, राग-द्वेष रूपी दो उल्लूओं को सुख देनेवाली है । जिसके अन्तःकरण में ममता हो और वह समझता हो कि मैं देख रहा हूँ, तो वह अवश्य ही या तो राग की दृष्टि से देख रहा होगा या द्वेष की दृष्टि से । वस्तुतः उसका देखना सर्वथा दोषरहित नहीं है । इसलिए जो वस्तु जैसी है उसे वह उसी रूप में न देखकर, अन्य रूपों में देखता है ।
Friday, 16 September 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
दाद की तरह ममता रोग होते हुए भी रोग प्रतीत नहीं होता और सुख और दुख दोनों की सृष्टि करता है । वास्तव में हम देखते हैं कि कभी-कभी मनुष्य इस ममता को लेकर स्वयं को अत्यंत सुखी अनुभव करता है । ममता का अर्थ है - ममत्व, मेरापन, वह वस्तु मेरी है, इस व्यक्ति से मेरा संबंध है, वह मेरा है, इत्यादि । इस मेरेपन के कारण व्यक्ति के ह्रदय में जिस लगाव का अनुभव होता है उसी का नाम ममता है । जिनमें हमें ममता होती है, उन्हें जब हम उन्नति करते देखते हैं, तो हमें बड़ी प्रसन्नता होती है । यही एक प्रकार की अनुभूति हो ऐसा नहीं है । यह भी होता है कि जिनसे हमारी ममता हो, यदि वे हमारी इच्छा के विरुद्ध कोई कार्य करते हैं या हमारी भावनाओं का ध्यान नहीं रखते तो हमारे ह्रदय में बड़ी पीड़ा होती है । ममता की इस वृत्ति को रामचरितमानस के विभिन्न प्रसंगों में विविध रूपों में प्रस्तुत किया गया है, हम इसकी चर्चा आने वाले दिनों में करेंगे ।
Thursday, 15 September 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
सन्निपात का वर्णन करने के बाद काकभुशुण्डिजी ने कहा कि मन की जितनी प्रकार की लालसाएँ हैं, वे सभी किसी-न किसी प्रकार के पीड़ा की सृष्टि करती हैं और इन असंख्य कामनाओं की तरह ही मन के रोग असंख्य हैं । लेकिन उनमें से कुछ मुख्य रोग जिनके बारे में कहा, सुना और समझा जा सकता है, उन्हें प्रस्तुत किया गया है । अब वे जिसका वर्णन करने जा रहे हैं, वह बड़ा विचित्र रोग है । यह रोग बहुधा हमें रोग ही प्रतीत नहीं होता, पर आध्यात्मिक जीवन में इसे काफी महत्व दिया गया है और उसे कहते हैं, "ममता" । ममता का वर्णन करते हुए उसकी तुलना शरीर के रोगों में 'दाद' से की गई । ममता मन का दाद है । यह दाद ऐसा विचित्र रोग है कि जिसके होने पर कोई यह नहीं समझता कि वह रोगी है । कभी उसको नहीं लगता कि यह कोई कष्ट देने वाला रोग है । जैसे अन्य रोगों में स्वस्थ होने की चेष्टा दिखाई देती है, वैसी इसमें दिखाई नहीं देती । गोस्वामीजी ने ममता की तुलना जो दाद से की है, इसका कारण बड़ा मनोवैज्ञानिक है । काम, क्रोध, लोभ की विकृति होने पर व्यक्ति जब अस्वस्थ होता है, तो उसे इसका स्पष्ट बोध रहता है, परन्तु यह बड़ी विचित्र बात है कि अपनी इस ममता की ओर व्यक्ति का ध्यान बहुधा जाता ही नहीं । वह सोच ही नहीं पाता कि मेरे मन में ममता नाम का कोई रोग है । ममता की इस विचित्रता पर गोस्वामीजी एक बड़ी ही सुन्दर व्यंग्यात्मक संकेत देते हैं कि अन्य रोग तो केवल दुख ही दुख देते हैं, पर यही एक ऐसा रोग है, जिसमें दुख और सुख दोनों की अनुभूति होती है । दाद में खुजलाहट होती है । उसे खुजलाकर आदमी बड़े सुख का अनुभव करता है और बाद में जलन होने पर कष्ट का अनुभव भी करता है । ये दोनों बातें ममता के साथ भी जुड़ी हुई हैं ।
Wednesday, 14 September 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
अयोध्या का सन्निपात तो शान्त हो गया, लेकिन लंका में जो सन्निपात था, वह पेट का था । उसमें कुछ पचता ही नहीं था । अब दवा ही न पचे तो लाभ कहाँ से हो । वहाँ पर सबसे बड़ी कठिनाई यही है कि बड़े-बड़े वैद्य गये और जितनी दवा दी गई, रावण को उनमें एक भी नहीं पचा । रावण को कभी पश्चाताप नहीं होता कि उसने श्रीसीताजी का हरण कर कोई भूल की है । उसे कभी इस बात पर पश्चाताप नहीं होता कि उसने अपने भाई से सोने की लंका छीनकर कोई भूल की है । उसे इस बात पर भी कभी पश्चाताप नहीं होता कि उसने विभीषण पर क्रोध करके कोई भूल की है । जब कोई अपनी भूल को स्वीकार ही नहीं करता, तब वह असाध्य सन्निपात ग्रस्त हो जाता है । लंका की समस्या यही है । और इस तरह दो नगरों के माध्यम से इन दो प्रकार के सन्निपातों को प्रस्तुत किया गया है । गोस्वामीजी ने मानो बताया कि बुराइयों के साथ हमारे अन्तर्मन में ग्लानि उत्पन्न होना, यह रोग को विनष्ट करने की सबसे पहली शर्त है ।
Tuesday, 13 September 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
कैकेयीजी जब चित्रकूट गयीं तो भगवान श्रीराम तीनों माताओं के बीच सबसे पहले कैकेयीजी के चरणों में प्रणाम कर उनके सीने से लिपट गए । गोस्वामीजी ने लिखा है - श्रीराम जब कैकेयीजी के ह्रदय से लग गये तो वे रोने लगीं । उन्हें लगा - अरे, इसी राम पर क्रोध करके मैंने वनवास दे दिया था, पर इसका व्यवहार आज भी मेरे प्रति वैसा ही है । पहले वह अपनी माता की अपेक्षा मुझे अधिक चाहता था, यह तो एक साधारण बात थी, लेकिन जब मैंने इसे इतना कष्ट दिया तब भी मेरे प्रति इसका वही पुराना भाव है । आज भी अपनी माता की अपेक्षा मुझे अधिक महत्व देता है । और भगवान राम तो कैकेयी अम्बा के ह्रदय लगकर कहने लगे - माँ, तुम बिल्कुल मत घबराना । मेरे ह्रदय की बात तो केवल तुम्हीं जानती हो । अगर तुमने मुझे वन न भेजा होता तो भरत का चरित्र, भरत का प्रेम समाज के सामने कैसे आता । यह दिव्य औषधि कैसे प्रकट होती ? इसलिए तुम दुख न करो । और तब कैकेयी ने अपने मन के तीव्र लोभ की निरर्थकता को देखा । अरे, जिस भरत के लिए मैंने इतना लोभ किया, उसने मुझसे कैसा व्यवहार किया, मेरी भर्त्सना की, मेरे राज्य के प्रस्ताव को अस्वीकार किया, जिसके कारण मैं विधवा हो गई, मुझ पर कितना बड़ा कलंक लगा, समाज से तिरस्कृत हो गयी और अन्त में भरत ने राज्य को अस्वीकार कर त्याग का जीवन स्वीकार कर लिया । उन्हें लोभ की व्यर्थता स्पष्ट दिखाई देने लगी । और भगवान राम के ह्रदय से लगने के बाद क्रोध की व्यर्थता दिखाई देने लगी । परिणाम यह हुआ कि सन्निपात शान्त हो गया और रामराज्य की स्थापना हुई ।
Monday, 12 September 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
भरतजी ने कैकेयीजी को कहा - आपका कल्याण तो पश्चाताप की अग्नि में जलने में है । आप अगर अपने आपको पश्चाताप की अग्नि में जलाएँगी तो आपके अपराध जलकर नष्ट हो जाएँगे । इसका अभिप्राय यह है कि आपकी भूल के कारण ही रामराज्य नहीं बन पाया, पिताजी की मृत्यु हुई, ऐसी स्थिति में अगर आप अपनी भूल को समझकर ग्लानि और पश्चातापपूर्वक श्रीराम को लौटा लाएँ, सिंहासन पर बैठाने की चेष्टा करें तो आपका अपराध धुल जाएगा । और इसके पश्चात सचमुच कैकेयी के मन में ग्लानि और पश्चाताप का उदय हुआ । गोस्वामीजी कहते हैं - कुटिल कैकेयी मन-ही-मन पश्चाताप से गली जाती हैं । किससे कहें और किसको दोष दें ? वे पृथ्वी तथा यमराज से याचना करती हैं, किन्तु धरती फटकर समा जाने के लिए रास्ता नहीं देती और विधाता मौत नहीं देते । यह तीव्रतम पश्चाताप उनके अन्तःकरण में उत्पन्न हुआ । उन्होंने देख लिया कि लोभ और क्रोध का कितना भयंकर परिणाम हुआ ।
Sunday, 11 September 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
सती होने के पीछे कैकेयीजी की मनोभावना क्या थी ? जब वे भरतजी के द्वारा भी तिरस्कृत हो गयीं तो उन्हें ऐसा लगा कि अब समाज में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं बचा, जिसके मन में मेरे प्रति रंचमात्र भी प्रेम हो या अपनत्व का भाव हो । अगर मैं जीवित रहूँगी तो सारे समाज के लोग मुझे घृणा और उपेक्षा की दृष्टि से देखेंगे । और तब कैकेयी के अहं ने कहा कि अब अपने कलंक को मिटाने का एक ही उपाय है कि मैं महाराज दशरथ के साथ सती हो जाऊँ । इससे लोग मेरे दोषों को भूल जाएँगे और उन्हें यही याद रहेगा कि कैकेयी तो बड़ी सती थीं, उन्होंने अपने पति के साथ अपने प्राणों का परित्याग कर दिया । लेकिन भरतजी ने तो माँ को सती होने नहीं दिया, अग्नि में नहीं जलने दिया । और उन्होंने कैकेयीजी को मानो याद दिला दिया कि अन्य माताएँ जो सती होना चाहती हैं, उनकी भावना को तो मैं समझ सकता हूँ कि उनके मन में पति के प्रति बड़ी प्रीति है, पर आप क्यों सती होना चाहती हैं ? और साथ-ही-साथ उन्होंने पूछ लिया कि मैंने तो सुना है कि स्त्रियाँ जब सती होती हैं तो पति के साथ परलोक में जाती हैं । तो क्या महाराज के साथ रहकर उनको कुछ और कष्ट देना बाकी है, जो उनके लोक में जाना चाहती हो ? वे आपको यहीं पर छोड़कर चले गए । उन्होंने आपको देखना भी पसन्द नहीं किया । आप सती होकर स्वर्ग में जाएँगी तो क्या पिताजी आपको वहाँ देखना पसन्द करेंगे ? भरतजी ने कहा - आप यदि जलना ही चाहती हैं तो जलने से मैं आपको नहीं रोकता । मैं नहीं कहता कि मत जलिए । मैं चाहता हूँ कि आप जलिए । लेकिन आपका कल्याण उस आग में जलने में नहीं है । आपका कल्याण तो पश्चाताप की अग्नि में जलने में है ।
Saturday, 10 September 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
महाराज दशरथ के शरीर त्यागने के बाद अंतिम संस्कार के समय जब सब रानियाँ सती होने के लिए चलीं, तो श्रीभरत ने कौशल्याजी और सुमित्राजी के चरण पकड़कर उन्हें सती होने से रोका । लेकिन उन्होंने कैकेयीजी को भी सती होने नहीं दिया । यदि वे चाहते कि कैकेयी को दण्ड मिले, तो वे यह सोच सकते थे कि चलो, अन्य माताओं को तो मैंने बचा लिया, पर कैकेयी यदि अपना शरीर जला दे तो अच्छा होगा । लेकिन यह बात श्रीभरत के मन में नहीं आई । वैद्य की दृष्टि यही है । कैकेयी को वे शरीर से नहीं मारना चाहते थे । वैद्य रोगी को नहीं मारता, वह तो रोग को मारने के लिए है । तो श्रीभरत को लगा कि यह तो उचित मार्ग नहीं है । इसलिए उन्होंने कड़वी दवा का प्रयोग किया ।
Friday, 9 September 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
महाराज दशरथ का तिरस्कार मिलने के बाद कैकेयी को लगा कि सम्पूर्ण अयोध्या के लोगों ने मेरा तिरस्कार कर दिया है । चारों ओर से कैकेयी कटी हुई थीं । लेकिन उनके मन में बस एक ही आशा ही थी - कोई बात नहीं, एक बार मेरा बेटा सिंहासन पर बैठ जाए, फिर मैं देख लूँगी कि कौन मेरा विरोध करता है । क्योकि सिंहासन और सत्ता के सामने सभी झुक जाते हैं इसलिए अपनी सारी आशाओं का केन्द्र उन्होंने भरत को बना लिया है । लेकिन भरतजी ने जब उनके रोग का निदान किया तो स्पष्ट हो गया कि इस समय यदि उन्होंने कैकेयीजी से मीठा व्यवहार किया तो वह उनके रोग को बढ़ा देगा । तब बड़े कठोर शब्दों में श्रीभरत ने कैकेयी को फटकारा । और आगे चलकर उन्होंने उनका तिरस्कार भी किया । पर उस तिरस्कार में विशेषता यह थी कि कैकेयीजी के मन में अपनी करनी के प्रति पश्चाताप उत्पन्न हुआ । उन्हें लगा कि मेरा लोभ और क्रोध कितना बुरा है । यही तो बुराई से छूटने का सबसे बड़ा और सही उपाय है ।
Thursday, 8 September 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
महाराज दशरथ के शरीर त्यागने के पश्चात कैकेयी में जो लोभ और क्रोध की वृत्ति है और जो सात्विक अहं है, इन सबकी चिकित्सा का भार महानतम् चिकित्सक श्रीभरत के ऊपर आया । श्रीभरत आए तो उन्होंने कैकेयी को सबसे पहले बहुत ही कड़वी दवा दी । वे समझ गये थे कि मीठी दवा से इनका उपचार नहीं होगा, क्योंकि कैकेयीजी तो सोने का थाल सजाकर और राज्य का प्रस्ताव लेकर खड़ी थीं । श्रीभरत ने सोचा कि अगर मैं मीठे शब्दों में इनका अभिवादन करूँगा तो इनके अर्न्तमन में जो लोभ और क्रोध की दुर्वृत्तियाँ उत्पन्न हो गयी हैं, उन्हें प्रोत्साहन मिलेगा और ये समझेंगी कि ये बड़े सार्थक हैं इसलिए कैकेयीजी ने जब उनके सामने राज्य का प्रस्ताव रखा तो उसके उत्तर में श्रीभरत ने कहा - अरी कुमति, जब तूने ह्रदय में यह बुरा निश्चय किया, उसी समय तुम्हारे ह्रदय के टुकड़े-टुकड़े क्यों नहीं हो गए ? वरदान माँगते समय क्या तुम्हारे मन में कुछ भी पीड़ा नहीं हुई । तुम्हारी जीभ क्यों नहीं गल गई ? तुम्हारे मुँह में कीड़े क्यों नहीं पड़ गए ? राजा ने तुम्हारा विश्वास कैसे कर लिया ? जान पड़ता है कि विधाता ने मरने से समय उनकी बुद्धि हर ली थी । बहुत से लोग कहते हैं कि श्रीभरत ने कैकेयीजी के लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया वह उचित नहीं था । लेकिन यह निर्णय तो वैद्य ही करेगा कि उसे कौन-सी दवा देनी है । आप यह उलाहना कैसे दे सकते हैं कि वैद्य ने मीठी दवा नहीं दी ।
Wednesday, 7 September 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
दशरथजी कैकेयी के भवन का परित्याग कर कौशल्याजी के भवन में गए । कौशल्या जी ने दशरथजी को बार-बार समझाया, पर वे अपनी इस बात पर दृढ़ रहे कि अब मैं इस शरीर का परित्याग कर दूँगा । कौशल्याजी ने पूछा - महाराज, आप शरीर का परित्याग क्यों करना चाहते हैं ? तो दशरथजी ने आँखों में आँसू भरकर कहा - जिस शरीर से मैंने इतने सत्कर्म किए, इतना विचार और सत्संग किया, फिर भी अपनी वासना को नहीं जीत पाया, और उस वासना के प्रवाह में मैंने कैकेयी को ऐसे वचन दे दिए । जो शरीर वासना के कलुष से मलिन हो चुका है वह अब राम की सेवा के योग्य नहीं है, उस शरीर को रखकर क्या करुँगा, जिसने मेरा प्रेम का प्रण नहीं निबाहा । हा रघुकुल को आनन्द देने वाले मेरे प्राण प्रिय राम, हा जानकी, लक्ष्मण, हा रघुवर, हा पिता के चित्तरुपी चातक के हित करने वाले मेघ । इस तरह बार-बार राम कहकर श्रीराम के विरह में राजा दशरथ शरीर त्यागकर स्वर्ग सिधार गए । महाराज दशरथ अपने काम की त्रुटि को समझ लेते हैं और अपने शरीर का बलिदान करके प्रायश्चित करते हैं । उनसे जो भूल हुई थी, उसका श्रीराम की स्मृति में डूबकर परिमार्जन कर देते हैं ।
Tuesday, 6 September 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
ज्योंही कैकेयी ने राम के लिए वनवास और भरत के लिए राज्य माँगा, त्योंही दशरथजी की आँखें ऐसे बदल गयीं कि उन्हें कैकेयी के 'सुमुख' के स्थान पर 'कुमुख' दिखाई देने लगा । पहले उनके मन में एक समझौता था । वे कैकेयी से भी प्यार करते थे और राम से भी । कैकेयी स्वयं राम से प्रेम करती थीं और राम भी कैकेयी से । अतः दशरथजी के इस द्विविध प्रेम में न कैकेयी को आपत्ति थी न राम को । और दशरथजी अपने जीवन में यही समझौता करके चल रहे थे कि राम और काम - दोनों का सुख बना रहे तो अच्छा । लेकिन यह दिखाई देने लगा कि दोनों एक साथ नहीं रह सकते, दोनों में से किसी एक को चुनना होगा, तब गोस्वामीजी कहते हैं - अब दशरथजी तुरन्त सावधान हो गए । अब उनकी वृत्ति बदली हुई है, दृष्टि बदली हुई है । अब उन्हें कैकेयी सुमुखी नहीं कुमुख लगने लगीं । जिन बड़े-बड़े नेत्रों वाली सुलोचनी पर रीझे हुए थे, अब वह तो भूखी बाघिन जैसी दीख रही थी । और जिसके स्वर मधुर लगते थे, पिकबचनी नहीं, यह तो बाज के समान भयंकर आक्रमणकारी वचन बोलने वाली लग रही थी । और जिन्हें वे गजगामिनी कहा करते थे उसे अब कहते हैं कि चाल नहीं, स्वभाव हाथी की तरह है । जैसे हाथी वृक्षों को उजाड़ देता है, इसी प्रकार मेरे मनोरथ के कल्पतरू को तुमने उखाड़ दिया । फिर दशरथजी बिना संकोच के कह देते हैं - तुम मेरी आँखों से दूर चली जाओ, मैं तुम्हारा मुँह भी नहीं देखना चाहता । और उनके यह कहने के बाद भी जब कैकेयी वहाँ से नहीं गई, तो वे स्वयं कैकेयी के भवन का परित्याग कर देते हैं । उन्हें अपने अन्तःकरण के इस काम की वृत्ति पर बड़ी ग्लानि होती है । उन्होंने काम की भयंकरता को देख लिया । इसका अभिप्राय यह है कि उनकी बुद्धि ने काम का समर्थन नहीं किया ।
Monday, 5 September 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........
श्री दशरथजी के जीवन में काम की दुर्बलता है । वह दुर्बलता मनु के रूप में भी उनमें थी और दशरथ के रूप में भी है । लेकिन इतना होते हुए भी बुद्धि से उन्होंने कभी भी अपने मन के इस दोष को अच्छा नहीं माना । बल्कि उनके मन में सदा इस बात की ग्लानि रही, यद्यपि वे कैकेयी के महल में कामी के रूप में ही गये, पर काम की बुराई को वे तुरन्त समझ गए । वर्णन आता है कि जब वे कैकेयी के महल में गये तो उनके शब्द हैं - महाराज दशरथ बार-बार कह रहे हैं - हे सुमुखी ! हे सुलोचनी ! हे कोकिलबयनी ! हे गजगामिनी ! मुझे अपने क्रोध का कारण तो बताओ । हे प्रिये, किसने तुम्हारा अनिष्ट किया ? किसके दो सिर हैं ? यमराज किसको ले जाना चाहते हैं ? कहो, किस राजा को कंगाल बना दूँ या किस राजा को देश से निकाल दूँ ? तुम्हारा शत्रु अमर भी हो, तो भी मैं उसे मार सकता हूँ । हे सुन्दरी ! तुम तो मेरा स्वभाव जानती ही हो कि मेरा मन सदा तुम्हारे मुखरूपी चन्द्रमा का चकोर है । हे प्रिये ! मेरी प्रजा, कुटुम्बी, सम्पत्ति, पुत्र, यहाँ तक कि मेरे प्राण भी, सब तुम्हारे वश में है । इस प्रकार महाराज दशरथ कैकेयीजी के सौन्दर्य की प्रशंसा करते हैं और उन्हें रिझाने की चेष्टा करते हैं । लेकिन उसकी एक सीमा थी । राम और काम में किसी एक का चुनाव करने का अवसर आ गया था । राम के प्रति भी उनके मन में आकर्षण है और काम के प्रति भी । पर जब दोनों आकर्षण प्रतिद्वन्द्वी बनकर सामने आ गए, तब यह नहीं हुआ कि दशरथजी राम के स्थान पर काम को चुन लें । राम की तुलना में उन्होंने काम को ही तुच्छ अनुभव किया ।
Sunday, 4 September 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........
अयोध्या में जो सन्निपात है, उसके महान वैद्य हैं श्रीभरत । वे आते हैं और क्रम से चिकित्सा प्रारंभ करते हैं । आयुर्वेदशास्त्र में तो बड़े विस्तार से इसका वर्णन किया गया है कि अगर कफ, वात और पित्त तीनों ही प्रबल हो गये हों तो उसकी चिकित्सा कहाँ से प्रारंभ करनी चाहिए ? कफ को पहले शान्त करें या पित्त को या वात को ? आयुर्वेद के अनुसार सन्निपात की चिकित्सा में वैद्य की बड़ी कठिन परीक्षा हो जाती है । इसका अभिप्राय यह है कि अगर एक ही धातु विकृत हुई तो वैद्य के सामने कोई कठिनाई नहीं होती । उसकी दवा वह दे देगा और विकृति शान्त हो जाएगी । पर जहाँ कई विकृत्तियाँ एक साथ आ गयी हों, वहाँ तो चुनना ही पड़ेगा कि किस विकृति को दूर करने के लिए किस क्रम का पालन करें । श्रीभरत ने सबसे पहले इसका ही निर्णय किया ।
Saturday, 3 September 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
मन्थरा कैकेयी के सामने भविष्य का एक भयावह काल्पनिक चित्र खींचते हुए कहती है - राम सिंहासन पर बैठेंगे, भरत बंदीगृह में रहेंगे और लक्ष्मण राम की ओर से राज्य चलायेंगे । लक्ष्मण को ही सबसे अधिक महत्व प्राप्त होगा । अब तो तुम्हें बस एक ही काम करना है - कौशल्या की सेवा, जो तुम्हारी सौत है । नौकरानी बनकर रहना पड़ेगा, तभी तुम इस घर में रह पाओगी, अन्यथा कोई उपाय नहीं है । बड़ी चोट लगी कैकेयी को । सोचने लगीं वे, अरे, मैं तो कौशल्या के बेटे को तो अपने बेटे से बढ़कर मानती थी, और कौशल्या के मन में मेरे लिए इतना बड़ा षड्यंत्र ! हो चाहे न हो, सामनेवाले ने तो पैठा दिया मन में ! जब कैकेयी ने यह सुना कि अच्छा, यह योजना है ! तब उसके मन में प्रतिहिंसा की वृत्ति जाग उठी । मन्थरा के इस काल्पनिक चित्र से कैकेयी के अहं को धक्का लगा और वह क्रोधित हो उठी । बदला लेने की वृत्ति आ गई । थोड़ी ही देर में कैकेयी इतनी बदल गयीं कि जो अभी मन्थरा को फटकार रही थीं, वे ही अब मन्थरा से क्षमा माँगते हुए कह रही हैं - मन्थरा, मैंने तुम्हें पहचानने में भूल की । इतने वर्षों तक तुम्हें मैंने पैरों में बैठाया पर तुम पैरों में बैठाने योग्य नहीं हो । अब तो तुम्हारा स्थान बदल गया है । कहाँ - अब तो मैं तुम्हें अपनी आँखों की पुतली बना लूँगी । अभिप्राय यह है कि अब मन्थरा की आँखों से ही देखना और मन्थरा के कानों से ही सुनना होगा । वहीं सुनेंगे जो मन्थरा कह रही है । वही देखेंगी जो मन्थरा दिखाएगी । वही कहेंगी जो मन्थरा कहलाएगी । यहाँ तक कि मन्थरा ने उनको अपना रूप तक दे दिया । जब वे चलने लगीं तो मन्थरा ने कहा - यहाँ नहीं, कोपभवन में जाओ । कोपभवन में जाने लगीं तो कहा - इतनी बढ़िया साड़ी-गहने पहनकर कोपभवन में ? वहाँ भला इसकी क्या शोभा ? आप मेरे कपड़े पहन लीजिए । उसने पूरा अपना वेश भी दे दिया । अपना ऐसा अनुगामी बनाया कि सचमुच महाराज दशरथ का काम, कैकेयी का क्रोध और लोभ आपस में मिला और सन्निपात हो गया ।
Friday, 2 September 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
काम बहुधा वर्तमानोन्मुख रहता है, क्रोध भूतोन्मुख और लोभ भविष्योन्मुख । क्रोध क्यों आता है ? यह सोचकर कि ऐसा क्यों नहीं हुआ ? जब क्रोध आता है तो भूतकाल पर ही आता है । जो बीत गया, उसी पर आता है । और काम का स्वभाव है वर्तमान को देखना । वर्तमान में जो प्यास है, जो वासना है, उसकी पूर्ति कैसे हो ? भूत तो देख लिया, वर्तमान सामने है, पर एक भविष्य ही ऐसा है जो दिखाई नहीं देता । उसकी आप चाहे जैसी विचित्र कल्पना कर लीजिए । पता नहीं कितने दिन जीवित रहेंगे ? कैसी-कैसी परिस्थितियाँ आएँगी । भविष्य तो पूरी तरह काल्पनिक है । और मन्थरा ने वही किया । उसने कहा कि आपने भूत को तो देख लिया कि राम आपसे बहुत प्रेम करते थे । और अब आप वर्तमान को देख रही हैं कि राम को राज्य देने की तैयारी चल रही है और आपको इसकी सूचना तक नहीं । भला आपसे छिपाने की क्या आवश्यकता थी ? कहाँ हैं आपके राम, जो सदा आपके महल में रहते थे ? जो महाराज दशरथ सबसे पहले आपके महल में आते थे, अपने किसी भी निर्णय को सर्वप्रथम आपसे कहते थे, वे सब अब कहाँ हैं ? सब कुछ कितना बदला हुआ चल रहा है । यह है आपका वर्तमान ! आज अयोध्या का प्रत्येक नागरिक जानता है कि कल राम को राज्य दिया जाएगा । पर क्या आप जानती हैं ? यह तो मैं बता रही हूँ आपको । तात्पर्य यह है कि अयोध्या में आज मेरे सिवा आपका कोई नहीं रह गया है । अब आप सोचिए कि आपका भविष्य क्या है ? और उसने कैकेयी के सामने भविष्य का एक भयावह काल्पनिक चित्र खींचकर रख दिया ।
Thursday, 1 September 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
मन्थरा जान गयी थी कि सात्विक अहंकार ही कैकेयी की सबसे बड़ी दुर्बलता है । और इसी अहं को पकड़कर वह अपनी योजना में सफल भी होती हैं । कैकेयीजी कहती हैं - मन्थरा क्या तुम जानती हो कि मैं पूजा-पाठ क्यों करती हूँ ? मैं तो ब्रह्मा से एक ही वरदान माँगती हूँ - यदि ब्रह्मा मुझे अगला जन्म दें तो राम मेरा पुत्र बने और सीता मेरी बहू । अब वैसे देखिए तो यह बड़ी श्रेष्ठ भावना है । राम और सीता को पाने की भावना क्या निन्दनीय है ? राम से संबंध जोड़ने की भावना, सीता से संबंध जोड़ने की वृत्ति श्रेष्ठ तो है ही, पर उस श्रेष्ठ वृत्ति के पीछे छिपा हुआ जो एक सात्विक अहं है, उसे मन्थरा ने देख लिया । बड़ी प्रसन्न हुई वह । कोई बात नहीं, राजसिक-तामसिक न सही सात्विक अहं तो है । मन्थरा को पता कैसे चला ? अगर कोई कैकेयी से पूछ दे कि आप यह जो चाहती हैं कि अगले जन्म में राम आपका पुत्र हो, सीता आपकी बहू बने, तो आप तो स्वयं कहती हैं कि राम मुझे अपनी माता से अधिक प्रेम करते हैं, तो आप कम क्यों होना चाहती हैं ? कैकेयीजी के मन में बात यह है कि ठीक है ! राम अपनी माता से अधिक चाहते हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं, लेकिन इतना होते हुए भी संसार में अगर पूछा जाय कि राम किसका बेटा है, तो वह कौशल्या का ही बेटा तो कहलाएगा, कैकेयी का बेटा तो कोई नहीं कहेगा । यही "मैं" है । राम को जैसे कौशल्या का बेटा कहा जाता है, उसी तरह मेरा बेटा कहा जाए, भले ही वह मुझसे प्रेम कम करे । उनके अन्तःकरण में जो राम से नाता जोड़ने की वृत्ति है, उसके मूल में यह सात्त्विक अहं है । और उसे ही पकड़कर मन्थरा ने बड़ी चतुराई से उनकी बुद्धि में विभ्रम उत्पन्न कर दिया ।
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