Monday, 5 September 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

श्री दशरथजी के जीवन में काम की दुर्बलता है । वह दुर्बलता मनु के रूप में भी उनमें थी और दशरथ के रूप में भी है । लेकिन इतना होते हुए भी बुद्धि से उन्होंने कभी भी अपने मन के इस दोष को अच्छा नहीं माना । बल्कि उनके मन में सदा इस बात की ग्लानि रही, यद्यपि वे कैकेयी के महल में कामी के रूप में ही गये, पर काम की बुराई को वे तुरन्त समझ गए । वर्णन आता है कि जब वे कैकेयी के महल में गये तो उनके शब्द हैं - महाराज दशरथ बार-बार कह रहे हैं - हे सुमुखी ! हे सुलोचनी ! हे कोकिलबयनी ! हे गजगामिनी ! मुझे अपने क्रोध का कारण तो बताओ । हे प्रिये, किसने तुम्हारा अनिष्ट किया ? किसके दो सिर हैं ? यमराज किसको ले जाना चाहते हैं ? कहो, किस राजा को कंगाल बना दूँ या किस राजा को देश से निकाल दूँ ? तुम्हारा शत्रु अमर भी हो, तो भी मैं उसे मार सकता हूँ । हे सुन्दरी ! तुम तो मेरा स्वभाव जानती ही हो कि मेरा मन सदा तुम्हारे मुखरूपी चन्द्रमा का चकोर है । हे प्रिये ! मेरी प्रजा, कुटुम्बी, सम्पत्ति, पुत्र, यहाँ तक कि मेरे प्राण भी, सब तुम्हारे वश में है । इस प्रकार महाराज दशरथ कैकेयीजी के सौन्दर्य की प्रशंसा करते हैं और उन्हें रिझाने की चेष्टा करते हैं । लेकिन उसकी एक सीमा थी । राम और काम में किसी एक का चुनाव करने का अवसर आ गया था । राम के प्रति भी उनके मन में आकर्षण है और काम के प्रति भी । पर जब दोनों आकर्षण प्रतिद्वन्द्वी बनकर सामने आ गए,  तब यह नहीं हुआ कि दशरथजी राम के स्थान पर काम को चुन लें । राम की तुलना में उन्होंने काम को ही तुच्छ अनुभव किया ।

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