परशुरामजी क्रोध से भरे हुए हैं । लक्ष्मणजी सामने आते हैं । और ऐसा बढ़िया निदान करते हैं कि रोग सीधे पकड़ में आ जाता है । इस बात पर न जाएँ कि कौन किस जाति का है । कई लोग तो यह कहने लगते हैं कि लक्ष्मणजी इतनी छोटी अवस्था के थे और परशुरामजी इतने वयोवृद्ध, लक्ष्मणजी को उनसे ऐसा नहीं बोलना चाहिए था । यहाँ अवस्था नहीं विचार की दृष्टि से देखिए । परशुरामजी क्रोध से भरे हुए हैं । लक्ष्मणजी पूछते हैं - आपको क्रोध क्यों आ रहा है ? तब वे कहते हैं - मेरे गुरुदेव का धनुष टूट गया, इसका मुझे बड़ा दुख है । लक्ष्मणजी ने कहा - नहीं महाराज, आपके दुख का कारण यह नहीं है । क्यों ? क्योंकि विश्व के इतिहास में क्या पहली बार धनुष टूटा है ? बचपन में जब हम श्रीराघवेन्द्र सहित चारों भाई खेला करते थे, तो रोज कोई-न-कोई धनुष तोड़ते ही रहते थे, पर आप तो कभी यह कहने नहीं आए कि धनुष क्यों तोड़ा ? वह भी तो धनुष ही था । उसका टूटना क्या टूटना नहीं था ? यह जीवन का एक महत्वपूर्ण सत्य है । हम मृत्यु पर दुखी होते हैं । पर मृत्यु तो सारे संसार में हर समय किसी-न-किसी की होती रहती है । पर क्या हम प्रत्येक व्यक्ति की मृत्यु पर दुखी होते हैं ? अगर होते भी हैं तो केवल व्यवहार की दृष्टि से दिखावे भर के लिए ही । लक्ष्मणजी स्पष्ट कह देते हैं - बचपन में हमने कितने ही धनुष तोड़े, पर कभी आपको क्रोध नहीं आया । इस धनुष के प्रति आपकी ममता का क्या कारण है ? उनका अभिप्राय यह था - महाराज, वस्तुतः आपको दुख यह धनुष नहीं, आपकी ममता दे रही है ।
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