भगवान राम न तो जाति की सीमा में आबद्ध थे और न अहं की । उन्होंने परशुरामजी से पूछ लिया - आप क्या चाहते हैं ? परशुरामजी ने कहा - तुम मुझसे युद्ध करो । क्यों ? महाराज ! युद्ध से क्या होगा ? यही न कि जो सबल होगा वह जीतेगा और दूसरा हारेगा । भगवान राम ने पूछा - तो आप युद्ध में विजय ही तो चाहते हैं । पर इसके लिए युद्ध की क्या आवश्यकता - हम तो सब प्रकार से आपसे हारे हुए हैं, आप हमारे अपराधों को क्षमा करें । हे नाथ ! हमारी और आपकी बराबरी कैसे ? कहाँ तो मेरा छोटा-सा 'राम' मात्र नाम और कहाँ आपका परशु सहित बड़ा नाम ? हे देव ! हमारे धनुष में तो बस एक ही डोरी है और आपके परम पवित्र धनुष में नौ डोरियाँ हैं । बड़ी अनोखी बात है, बड़ा बनने की चेष्टा करने वाला छोटा बन गया और छोटा बनने वाला बड़ा । परशुराम कहते हैं - मैं बड़ा हूँ और राम कहते हैं - मैं छोटा हूँ । लेकिन बात उलट गई । बाद में परशुरामजी हाथ जोड़कर श्रीराम की स्तुति करने लगे । उनका वर्णाभिमान मिटा होगा, तभी तो उन्होंने स्तुति की होगी । जाति-वर्ण की सीमा टूट गई । पूर्ण के सामने अपूर्णता दूर हो गई ।
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