सन्निपात का वर्णन करने के बाद काकभुशुण्डिजी ने कहा कि मन की जितनी प्रकार की लालसाएँ हैं, वे सभी किसी-न किसी प्रकार के पीड़ा की सृष्टि करती हैं और इन असंख्य कामनाओं की तरह ही मन के रोग असंख्य हैं । लेकिन उनमें से कुछ मुख्य रोग जिनके बारे में कहा, सुना और समझा जा सकता है, उन्हें प्रस्तुत किया गया है । अब वे जिसका वर्णन करने जा रहे हैं, वह बड़ा विचित्र रोग है । यह रोग बहुधा हमें रोग ही प्रतीत नहीं होता, पर आध्यात्मिक जीवन में इसे काफी महत्व दिया गया है और उसे कहते हैं, "ममता" । ममता का वर्णन करते हुए उसकी तुलना शरीर के रोगों में 'दाद' से की गई । ममता मन का दाद है । यह दाद ऐसा विचित्र रोग है कि जिसके होने पर कोई यह नहीं समझता कि वह रोगी है । कभी उसको नहीं लगता कि यह कोई कष्ट देने वाला रोग है । जैसे अन्य रोगों में स्वस्थ होने की चेष्टा दिखाई देती है, वैसी इसमें दिखाई नहीं देती । गोस्वामीजी ने ममता की तुलना जो दाद से की है, इसका कारण बड़ा मनोवैज्ञानिक है । काम, क्रोध, लोभ की विकृति होने पर व्यक्ति जब अस्वस्थ होता है, तो उसे इसका स्पष्ट बोध रहता है, परन्तु यह बड़ी विचित्र बात है कि अपनी इस ममता की ओर व्यक्ति का ध्यान बहुधा जाता ही नहीं । वह सोच ही नहीं पाता कि मेरे मन में ममता नाम का कोई रोग है । ममता की इस विचित्रता पर गोस्वामीजी एक बड़ी ही सुन्दर व्यंग्यात्मक संकेत देते हैं कि अन्य रोग तो केवल दुख ही दुख देते हैं, पर यही एक ऐसा रोग है, जिसमें दुख और सुख दोनों की अनुभूति होती है । दाद में खुजलाहट होती है । उसे खुजलाकर आदमी बड़े सुख का अनुभव करता है और बाद में जलन होने पर कष्ट का अनुभव भी करता है । ये दोनों बातें ममता के साथ भी जुड़ी हुई हैं ।
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