Thursday, 8 September 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

महाराज दशरथ के शरीर त्यागने के पश्चात कैकेयी में जो लोभ और क्रोध की वृत्ति है और जो सात्विक अहं है, इन सबकी चिकित्सा का भार महानतम् चिकित्सक श्रीभरत के ऊपर आया । श्रीभरत आए तो उन्होंने कैकेयी को सबसे पहले बहुत ही कड़वी दवा दी । वे समझ गये थे कि मीठी दवा से इनका उपचार नहीं होगा, क्योंकि कैकेयीजी तो सोने का थाल सजाकर और राज्य का प्रस्ताव लेकर खड़ी थीं । श्रीभरत ने सोचा कि अगर मैं मीठे शब्दों में इनका अभिवादन करूँगा तो इनके अर्न्तमन में जो लोभ और क्रोध की दुर्वृत्तियाँ उत्पन्न हो गयी हैं, उन्हें प्रोत्साहन मिलेगा और ये समझेंगी कि ये बड़े सार्थक हैं इसलिए कैकेयीजी ने जब उनके सामने राज्य का प्रस्ताव रखा तो उसके उत्तर में श्रीभरत ने कहा - अरी कुमति, जब तूने ह्रदय में यह बुरा निश्चय किया, उसी समय तुम्हारे ह्रदय के टुकड़े-टुकड़े क्यों नहीं हो गए ? वरदान माँगते समय क्या तुम्हारे मन में कुछ भी पीड़ा नहीं हुई । तुम्हारी जीभ क्यों नहीं गल गई ? तुम्हारे मुँह में कीड़े क्यों नहीं पड़ गए ? राजा ने तुम्हारा विश्वास कैसे कर लिया ? जान पड़ता है कि विधाता ने मरने से समय उनकी बुद्धि हर ली थी । बहुत से लोग कहते हैं कि श्रीभरत ने कैकेयीजी के लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया वह उचित नहीं था । लेकिन यह निर्णय तो वैद्य ही करेगा कि उसे कौन-सी दवा देनी है । आप यह उलाहना कैसे दे सकते हैं कि वैद्य ने मीठी दवा नहीं दी ।

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