Tuesday, 20 September 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

परशुरामजी द्वारा श्रीराम को न पहचान पाने का तात्पर्य क्या है ? श्रीराम भी ईश्वर के अवतार हैं और परशुरामजी भी । वैसे विचार करके देखें तो वेदांत की दृष्टि से प्रत्येक जीव ईश्वर का ही अंश है, अतः उसमें ईश्वर के लक्षण भी विद्यमान हैं और जीव के भी । जीव अपूर्ण है और वह अपूर्णता क्या है ? अज्ञान ! जीव की अपूर्णता अभावजन्य नहीं, अज्ञानजन्य है । परशुरामजी की समस्या क्या है ? वे अशान्त क्यों हैं, दुखी क्यों हैं ? विवाद क्यों करते हैं ? - अज्ञान के कारण और उनकी सारी समस्याओं का समाधान कब हुआ ? 'जाना राम प्रभाव तब' - जान लेने पर । परशुरामजी ने श्रीराम को पहचान लिया । उनका क्रोध शान्त हो गया और ग्लानि दूर हो गई । गोस्वामीजी ने अपनी शैली में लिखा - 'राम से राम बोले' यह कहकर गोस्वामीजी यहाँ यह बताना चाहते थे कि यह प्रकाश और अन्धकार के बीच की बात नहीं है, यह प्रकाश और प्रकाश के बीच की बात है । झगड़ा समाप्त हो गया । न कोई युद्ध हुआ और न शस्त्र चले । केवल जान लेने से ही सारा झगड़ा समाप्त हो गया । अब वे राम के स्वरूप को पहचान गये थे, उनकी परिपूर्णता को जान गये थे । दोनों के बीच जो दूरी थी, वह मिट गई । अभिप्राय यह है कि जब  तक स्वरूप की विस्मृति है, तभी तक टकराहट है । जब स्वरूप की स्मृति हो जाती है, स्वरूप का ज्ञान हो जाता है, तब जैसे कोई स्वयं से नहीं लड़ता, उसी प्रकार राम से राम का न लड़ना स्वाभाविक है । यह हुआ ज्ञान के सन्दर्भ में ।

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