मन्थरा कैकेयी के सामने भविष्य का एक भयावह काल्पनिक चित्र खींचते हुए कहती है - राम सिंहासन पर बैठेंगे, भरत बंदीगृह में रहेंगे और लक्ष्मण राम की ओर से राज्य चलायेंगे । लक्ष्मण को ही सबसे अधिक महत्व प्राप्त होगा । अब तो तुम्हें बस एक ही काम करना है - कौशल्या की सेवा, जो तुम्हारी सौत है । नौकरानी बनकर रहना पड़ेगा, तभी तुम इस घर में रह पाओगी, अन्यथा कोई उपाय नहीं है । बड़ी चोट लगी कैकेयी को । सोचने लगीं वे, अरे, मैं तो कौशल्या के बेटे को तो अपने बेटे से बढ़कर मानती थी, और कौशल्या के मन में मेरे लिए इतना बड़ा षड्यंत्र ! हो चाहे न हो, सामनेवाले ने तो पैठा दिया मन में ! जब कैकेयी ने यह सुना कि अच्छा, यह योजना है ! तब उसके मन में प्रतिहिंसा की वृत्ति जाग उठी । मन्थरा के इस काल्पनिक चित्र से कैकेयी के अहं को धक्का लगा और वह क्रोधित हो उठी । बदला लेने की वृत्ति आ गई । थोड़ी ही देर में कैकेयी इतनी बदल गयीं कि जो अभी मन्थरा को फटकार रही थीं, वे ही अब मन्थरा से क्षमा माँगते हुए कह रही हैं - मन्थरा, मैंने तुम्हें पहचानने में भूल की । इतने वर्षों तक तुम्हें मैंने पैरों में बैठाया पर तुम पैरों में बैठाने योग्य नहीं हो । अब तो तुम्हारा स्थान बदल गया है । कहाँ - अब तो मैं तुम्हें अपनी आँखों की पुतली बना लूँगी । अभिप्राय यह है कि अब मन्थरा की आँखों से ही देखना और मन्थरा के कानों से ही सुनना होगा । वहीं सुनेंगे जो मन्थरा कह रही है । वही देखेंगी जो मन्थरा दिखाएगी । वही कहेंगी जो मन्थरा कहलाएगी । यहाँ तक कि मन्थरा ने उनको अपना रूप तक दे दिया । जब वे चलने लगीं तो मन्थरा ने कहा - यहाँ नहीं, कोपभवन में जाओ । कोपभवन में जाने लगीं तो कहा - इतनी बढ़िया साड़ी-गहने पहनकर कोपभवन में ? वहाँ भला इसकी क्या शोभा ? आप मेरे कपड़े पहन लीजिए । उसने पूरा अपना वेश भी दे दिया । अपना ऐसा अनुगामी बनाया कि सचमुच महाराज दशरथ का काम, कैकेयी का क्रोध और लोभ आपस में मिला और सन्निपात हो गया ।
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