Monday, 12 September 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

भरतजी ने कैकेयीजी को कहा - आपका कल्याण तो पश्चाताप की अग्नि में जलने में है । आप अगर अपने आपको पश्चाताप की अग्नि में जलाएँगी तो आपके अपराध जलकर नष्ट हो जाएँगे । इसका अभिप्राय यह है कि आपकी भूल के कारण ही रामराज्य नहीं बन पाया, पिताजी की मृत्यु हुई, ऐसी स्थिति में अगर आप अपनी भूल को समझकर ग्लानि और पश्चातापपूर्वक श्रीराम को लौटा लाएँ, सिंहासन पर बैठाने की चेष्टा करें तो आपका अपराध धुल जाएगा । और इसके पश्चात सचमुच कैकेयी के मन में ग्लानि और पश्चाताप का उदय हुआ । गोस्वामीजी कहते हैं - कुटिल कैकेयी मन-ही-मन पश्चाताप से गली जाती हैं । किससे कहें और किसको दोष दें ? वे पृथ्वी तथा यमराज से याचना करती हैं, किन्तु धरती फटकर समा जाने के लिए रास्ता नहीं देती और विधाता मौत नहीं देते । यह तीव्रतम पश्चाताप उनके अन्तःकरण में उत्पन्न हुआ । उन्होंने देख लिया कि लोभ और क्रोध का कितना भयंकर परिणाम हुआ ।

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