Sunday, 18 September 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

रामचरितमानस में विभिन्न प्रसंगों में ममता की विभिन्न रूपों की व्याख्या की गयी है । गोस्वामीजी ज्ञान, भक्ति और कर्म - तीनों के सन्दर्भ में ममता का स्वरूप स्पष्ट करते हुए इसकी बड़ी मनोवैज्ञानिक व्याख्या करते हैं । ज्ञानी के जीवन में तो ममता सर्वथा त्याज्य है ही, भक्त के जीवन में भी ममता ईश्वर समर्पित हो जाती है और कर्मयोगी को भी अपने जीवन में इसे धीरे-धीरे समेटना चाहिए । इस तरह ज्ञान, भक्ति और कर्म तीनों के सन्दर्भ में ममता की चर्चा की गयी है और उसकी विविध वृत्तियों की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया गया है । रामायण में एक ऐसा प्रसंग है, जिसे लोग बड़े आनन्द से पढ़ते या सुनते हैं । परन्तु जिस सन्दर्भ में उसे पढ़ा या सुना जाता है, वही उसका भाव नहीं है । वह एक बड़ा ही रोचक प्रसंग है । विशेषकर जब कहीं रामलीला चल रही हो तो उसमें अन्य लीलाएं तो कुछ घण्टों में समाप्त हो जाती हैं, पर जब लक्ष्मण-परशुराम संवाद प्रारंभ होता है, तो वह रात-भर चलता रहता है । रामायण में जितना है, उससे भी बहुत आगे बढ़कर वह संवाद होता है और दर्शक तथा श्रोता इस संवाद में बड़ा आनन्द लेते हैं । लेकिन उनके आनन्द लेने की वृत्ति जिस स्तर की है और उसे जिस स्तर पर प्रस्तुत किया जाता है, उसे बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता । इसलिए एक सन्त ने अपने आश्रम में चल रही रामलीला में लक्ष्मण-परशुराम संवाद के दिन उमड़ी भीड़ को देखकर प्रसन्न होने के स्थान पर दुख प्रकट करते हुए कहा कि इससे पता चलता है कि रामलीला में भी लोग झगड़ा देखना ही पसन्द करते हैं । शान्ति की बातें पसन्द नहीं करते । जिसमें समत्व हो, शान्ति हो, भक्ति हो, वैराग्य हो ; उसमें उतना रस नहीं आता, जितना कि तू-तू मैं-मैं में आता है । साधारण दृष्टि से देखें तो लक्ष्मण-परशुराम संवाद का प्रसंग तू-तू मैं-मैं का प्रसंग प्रतीत होता है । और उसमें व्यक्ति को ऐसा कुछ सन्तोष मिलता है कि चलो रामायण में भी कुछ ऐसे पात्र हैं, जो हम लोगों की तरह तू-तू मैं-मैं करते हैं । और इससे ह्रदय में ऐसी वृत्ति आती है कि इतने महान पात्र भी जब ऐसा कर सकते हैं, तो हम भी ऐसा करके कोई गलत काम नहीं करते । इसको अलग-अलग देखनेवाले अलग-अलग रूपों में देखते हैं ।

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