Wednesday, 7 September 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

दशरथजी कैकेयी के भवन का परित्याग कर कौशल्याजी के भवन में गए । कौशल्या जी ने दशरथजी को बार-बार समझाया, पर वे अपनी इस बात पर दृढ़ रहे कि अब मैं इस शरीर का परित्याग कर दूँगा । कौशल्याजी ने पूछा - महाराज, आप शरीर का परित्याग क्यों करना चाहते हैं ? तो दशरथजी ने आँखों में आँसू भरकर कहा - जिस शरीर से मैंने इतने सत्कर्म किए, इतना विचार और सत्संग किया, फिर भी अपनी वासना को नहीं जीत पाया, और उस वासना के प्रवाह में मैंने कैकेयी को ऐसे वचन दे दिए । जो शरीर वासना के कलुष से मलिन हो चुका है वह अब राम की सेवा के योग्य नहीं है, उस शरीर को रखकर क्या करुँगा, जिसने मेरा प्रेम का प्रण नहीं निबाहा । हा रघुकुल को आनन्द देने वाले मेरे प्राण प्रिय राम, हा जानकी, लक्ष्मण, हा रघुवर, हा पिता के चित्तरुपी चातक के हित करने वाले मेघ । इस तरह बार-बार राम कहकर श्रीराम के विरह में राजा दशरथ शरीर त्यागकर स्वर्ग सिधार गए । महाराज दशरथ अपने काम की त्रुटि को समझ लेते हैं और अपने शरीर का बलिदान करके प्रायश्चित करते हैं । उनसे जो भूल हुई थी, उसका श्रीराम की स्मृति में डूबकर परिमार्जन कर देते हैं ।

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