महाराज दशरथ का तिरस्कार मिलने के बाद कैकेयी को लगा कि सम्पूर्ण अयोध्या के लोगों ने मेरा तिरस्कार कर दिया है । चारों ओर से कैकेयी कटी हुई थीं । लेकिन उनके मन में बस एक ही आशा ही थी - कोई बात नहीं, एक बार मेरा बेटा सिंहासन पर बैठ जाए, फिर मैं देख लूँगी कि कौन मेरा विरोध करता है । क्योकि सिंहासन और सत्ता के सामने सभी झुक जाते हैं इसलिए अपनी सारी आशाओं का केन्द्र उन्होंने भरत को बना लिया है । लेकिन भरतजी ने जब उनके रोग का निदान किया तो स्पष्ट हो गया कि इस समय यदि उन्होंने कैकेयीजी से मीठा व्यवहार किया तो वह उनके रोग को बढ़ा देगा । तब बड़े कठोर शब्दों में श्रीभरत ने कैकेयी को फटकारा । और आगे चलकर उन्होंने उनका तिरस्कार भी किया । पर उस तिरस्कार में विशेषता यह थी कि कैकेयीजी के मन में अपनी करनी के प्रति पश्चाताप उत्पन्न हुआ । उन्हें लगा कि मेरा लोभ और क्रोध कितना बुरा है । यही तो बुराई से छूटने का सबसे बड़ा और सही उपाय है ।
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