कैकेयीजी जब चित्रकूट गयीं तो भगवान श्रीराम तीनों माताओं के बीच सबसे पहले कैकेयीजी के चरणों में प्रणाम कर उनके सीने से लिपट गए । गोस्वामीजी ने लिखा है - श्रीराम जब कैकेयीजी के ह्रदय से लग गये तो वे रोने लगीं । उन्हें लगा - अरे, इसी राम पर क्रोध करके मैंने वनवास दे दिया था, पर इसका व्यवहार आज भी मेरे प्रति वैसा ही है । पहले वह अपनी माता की अपेक्षा मुझे अधिक चाहता था, यह तो एक साधारण बात थी, लेकिन जब मैंने इसे इतना कष्ट दिया तब भी मेरे प्रति इसका वही पुराना भाव है । आज भी अपनी माता की अपेक्षा मुझे अधिक महत्व देता है । और भगवान राम तो कैकेयी अम्बा के ह्रदय लगकर कहने लगे - माँ, तुम बिल्कुल मत घबराना । मेरे ह्रदय की बात तो केवल तुम्हीं जानती हो । अगर तुमने मुझे वन न भेजा होता तो भरत का चरित्र, भरत का प्रेम समाज के सामने कैसे आता । यह दिव्य औषधि कैसे प्रकट होती ? इसलिए तुम दुख न करो । और तब कैकेयी ने अपने मन के तीव्र लोभ की निरर्थकता को देखा । अरे, जिस भरत के लिए मैंने इतना लोभ किया, उसने मुझसे कैसा व्यवहार किया, मेरी भर्त्सना की, मेरे राज्य के प्रस्ताव को अस्वीकार किया, जिसके कारण मैं विधवा हो गई, मुझ पर कितना बड़ा कलंक लगा, समाज से तिरस्कृत हो गयी और अन्त में भरत ने राज्य को अस्वीकार कर त्याग का जीवन स्वीकार कर लिया । उन्हें लोभ की व्यर्थता स्पष्ट दिखाई देने लगी । और भगवान राम के ह्रदय से लगने के बाद क्रोध की व्यर्थता दिखाई देने लगी । परिणाम यह हुआ कि सन्निपात शान्त हो गया और रामराज्य की स्थापना हुई ।
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