Tuesday, 6 September 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

ज्योंही कैकेयी ने राम के लिए वनवास और भरत के लिए राज्य माँगा, त्योंही दशरथजी की आँखें ऐसे बदल गयीं कि उन्हें कैकेयी के 'सुमुख' के स्थान पर 'कुमुख' दिखाई देने लगा । पहले उनके मन में एक समझौता था । वे कैकेयी से भी प्यार करते थे और राम से भी । कैकेयी स्वयं राम से प्रेम करती थीं और राम भी कैकेयी से । अतः दशरथजी के इस द्विविध प्रेम में न कैकेयी को आपत्ति थी न राम को । और दशरथजी अपने जीवन में यही समझौता करके चल रहे थे कि राम और काम - दोनों का सुख बना रहे तो अच्छा । लेकिन यह दिखाई देने लगा कि दोनों एक साथ नहीं रह सकते, दोनों में से किसी एक को चुनना होगा, तब गोस्वामीजी कहते हैं - अब दशरथजी तुरन्त सावधान हो गए । अब उनकी वृत्ति बदली हुई है, दृष्टि बदली हुई है । अब उन्हें कैकेयी सुमुखी नहीं कुमुख लगने लगीं । जिन बड़े-बड़े नेत्रों वाली सुलोचनी पर रीझे हुए थे, अब वह तो भूखी बाघिन जैसी दीख रही थी । और जिसके स्वर मधुर लगते थे, पिकबचनी नहीं, यह तो बाज के समान भयंकर आक्रमणकारी वचन बोलने वाली लग रही थी । और जिन्हें वे गजगामिनी कहा करते थे उसे अब कहते हैं कि चाल नहीं, स्वभाव हाथी की तरह है । जैसे हाथी वृक्षों को उजाड़ देता है, इसी प्रकार मेरे मनोरथ के कल्पतरू को तुमने उखाड़ दिया । फिर दशरथजी बिना संकोच के कह देते हैं - तुम मेरी आँखों से दूर चली जाओ, मैं तुम्हारा मुँह भी नहीं देखना चाहता । और उनके यह कहने के बाद भी जब कैकेयी वहाँ से नहीं गई, तो वे स्वयं कैकेयी के भवन का परित्याग कर देते हैं । उन्हें अपने अन्तःकरण के इस काम की वृत्ति पर बड़ी ग्लानि होती है । उन्होंने काम की भयंकरता को देख लिया । इसका अभिप्राय यह है कि उनकी बुद्धि ने काम का समर्थन नहीं किया ।

No comments:

Post a Comment