गोस्वामीजी ने एक प्रसंग में तो ममता को मन का दाद कहा, पर अन्यत्र एक प्रसंग में ममता की तुलना धागे से की - माता, पिता, भाई, पुत्र, पत्नी, शरीर, धन, गृह, मित्र और संबंधी - इन सबके प्रेमरूपी धागों को एकत्र कर डोरी बना ले । यहाँ पर ममता को धागा कहा गया । धागा बन्धन का हेतु है । लेकिन एक तीसरे प्रसंग में तो बड़ी मनोवैज्ञानिक बात कही गयी है - "ममता तरुन तमी अँधियारी" - ममता अँधेरी रात है । अमावस्या की गहरी रात में कुछ भी दिखाई नहीं देता । पर ममता के लिए इस उपमा की क्या सार्थकता है ? ऐसा तो नहीं लगता कि ममता होने पर दिखाई न देता हो । तब गोस्वामीजी व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि यह कब कहा कि अँधेरी रात में दिखाई नहीं देता । पर हाँ, सबको दिखाई नहीं देता । जिसे दिखाई देता है, वह उल्लू को छोड़ और कौन होगा ? किसी के मन में ममता हो और वह यदि कहे कि मुझे दिखाई दे रहा है तो समझ लेना कि वह कौन है ? जैसे सामान्यतः देखने के लिए व्यक्ति की दो आँखें होती हैं, उसी तरह ममता की अँधेरी रात में देखने वाले ये उल्लू भी दो हैं । ये दो उल्लू कौन हैं - "राग द्वेष उलूक सुखकारी" - ममता घनी अँधेरी रात है, राग-द्वेष रूपी दो उल्लूओं को सुख देनेवाली है । जिसके अन्तःकरण में ममता हो और वह समझता हो कि मैं देख रहा हूँ, तो वह अवश्य ही या तो राग की दृष्टि से देख रहा होगा या द्वेष की दृष्टि से । वस्तुतः उसका देखना सर्वथा दोषरहित नहीं है । इसलिए जो वस्तु जैसी है उसे वह उसी रूप में न देखकर, अन्य रूपों में देखता है ।
No comments:
Post a Comment