महाराज दशरथ के शरीर त्यागने के बाद अंतिम संस्कार के समय जब सब रानियाँ सती होने के लिए चलीं, तो श्रीभरत ने कौशल्याजी और सुमित्राजी के चरण पकड़कर उन्हें सती होने से रोका । लेकिन उन्होंने कैकेयीजी को भी सती होने नहीं दिया । यदि वे चाहते कि कैकेयी को दण्ड मिले, तो वे यह सोच सकते थे कि चलो, अन्य माताओं को तो मैंने बचा लिया, पर कैकेयी यदि अपना शरीर जला दे तो अच्छा होगा । लेकिन यह बात श्रीभरत के मन में नहीं आई । वैद्य की दृष्टि यही है । कैकेयी को वे शरीर से नहीं मारना चाहते थे । वैद्य रोगी को नहीं मारता, वह तो रोग को मारने के लिए है । तो श्रीभरत को लगा कि यह तो उचित मार्ग नहीं है । इसलिए उन्होंने कड़वी दवा का प्रयोग किया ।
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