Sunday, 11 September 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

सती होने के पीछे कैकेयीजी की मनोभावना क्या थी ? जब वे भरतजी के द्वारा भी तिरस्कृत हो गयीं तो उन्हें ऐसा लगा कि अब समाज में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं बचा, जिसके मन में मेरे प्रति रंचमात्र भी प्रेम हो या अपनत्व का भाव हो । अगर मैं जीवित रहूँगी तो सारे समाज के लोग मुझे घृणा और उपेक्षा की दृष्टि से देखेंगे । और तब कैकेयी के अहं ने कहा कि अब अपने कलंक को मिटाने का एक ही उपाय है कि मैं महाराज दशरथ के साथ सती हो जाऊँ । इससे लोग मेरे दोषों को भूल जाएँगे और उन्हें यही याद रहेगा कि कैकेयी तो बड़ी सती थीं, उन्होंने अपने पति के साथ अपने प्राणों का परित्याग कर दिया । लेकिन भरतजी ने तो माँ को सती होने नहीं दिया, अग्नि में नहीं जलने दिया । और उन्होंने कैकेयीजी को मानो याद दिला दिया कि अन्य माताएँ जो सती होना चाहती हैं, उनकी भावना को तो मैं समझ सकता हूँ कि उनके मन में पति के प्रति बड़ी प्रीति है, पर आप क्यों सती होना चाहती हैं ? और साथ-ही-साथ उन्होंने पूछ लिया कि मैंने तो सुना है कि स्त्रियाँ जब सती होती हैं तो पति के साथ परलोक में जाती हैं । तो क्या महाराज के साथ रहकर उनको कुछ और कष्ट देना बाकी है, जो उनके लोक में जाना चाहती हो ? वे आपको यहीं पर छोड़कर चले गए । उन्होंने आपको देखना भी पसन्द नहीं किया । आप सती होकर स्वर्ग में जाएँगी तो क्या पिताजी आपको वहाँ देखना पसन्द करेंगे ? भरतजी ने कहा - आप यदि जलना ही चाहती हैं तो जलने से मैं आपको नहीं रोकता । मैं नहीं कहता कि मत जलिए । मैं चाहता हूँ कि आप जलिए । लेकिन आपका कल्याण उस आग में जलने में नहीं है । आपका कल्याण तो पश्चाताप की अग्नि में जलने में है ।

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