Friday, 2 September 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

काम बहुधा वर्तमानोन्मुख रहता है, क्रोध भूतोन्मुख और लोभ भविष्योन्मुख । क्रोध क्यों आता है ? यह सोचकर कि ऐसा क्यों नहीं हुआ ? जब क्रोध आता है तो भूतकाल पर ही आता है । जो बीत गया, उसी पर आता है । और काम का स्वभाव है वर्तमान को देखना । वर्तमान में जो प्यास है, जो वासना है, उसकी पूर्ति कैसे हो ? भूत तो देख लिया, वर्तमान सामने है, पर एक भविष्य ही ऐसा है जो दिखाई नहीं देता । उसकी आप चाहे जैसी विचित्र कल्पना कर लीजिए । पता नहीं कितने दिन जीवित रहेंगे ? कैसी-कैसी परिस्थितियाँ आएँगी । भविष्य तो पूरी तरह काल्पनिक है । और मन्थरा ने वही किया । उसने कहा कि आपने भूत को तो देख लिया कि राम आपसे बहुत प्रेम करते थे । और अब आप वर्तमान को देख रही हैं कि राम को राज्य देने की तैयारी चल रही है और आपको इसकी सूचना तक नहीं । भला आपसे छिपाने की क्या आवश्यकता थी ? कहाँ हैं आपके राम, जो सदा आपके महल में रहते थे ? जो महाराज दशरथ सबसे पहले आपके महल में आते थे, अपने किसी भी निर्णय को सर्वप्रथम आपसे कहते थे, वे सब अब कहाँ हैं ? सब कुछ कितना बदला हुआ चल रहा है । यह है आपका वर्तमान ! आज अयोध्या का प्रत्येक नागरिक जानता है कि कल राम को राज्य दिया जाएगा । पर क्या आप जानती हैं ? यह तो मैं बता रही हूँ आपको । तात्पर्य यह है कि अयोध्या में आज मेरे सिवा आपका कोई नहीं रह गया है । अब आप सोचिए कि आपका भविष्य क्या है ? और उसने कैकेयी के सामने भविष्य का एक भयावह काल्पनिक चित्र खींचकर रख दिया ।

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