Thursday, 22 September 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

भगवान राम और लक्ष्मण से परशुरामजी के संवाद का क्या तात्पर्य है ? वस्तुतः यह दो समस्याओं और दो समाधानों के बीच संवाद है । परशुरामजी की अहंता को दूर किया श्रीराम ने और ममता को दूर किया लक्ष्मणजी ने और यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है । भगवान राम हैं ज्ञानघन और अहंकार होता है अज्ञान से । लक्ष्मणजी वैराग्यमूर्ति और ममता होती है आसक्ति से । मनुष्य के जीवन में जब अहंकार की वृत्ति आती है तब वह अपने को बहुत बड़ा समझने लगता है । कई बार तो हम अहंकार की वृत्ति यह सोचकर स्वीकार कर लेते हैं कि इससे हम बड़े हो जायेंगे । परन्तु अहंकार के द्वारा व्यक्ति बड़ा नहीं, सिमट कर छोटा हो जाता है । क्यों ? अहं के लिए वह अपने आपको किसी-न-किसी सीमा में आबद्ध कर लेता है । चाहे वह देश की हो या जाति की या धर्म की, वह एक सीमा में सिमट जाता है । दोनों राम खड़े हैं । दोनों में क्या अन्तर दिखाई दे रहा है ? परशुरामजी भगवान राम से कहते हैं कि तुम मुझसे युद्ध करो और भगवान राम उनसे विनम्रतापूर्वक पूछते हैं कि यदि मैं आपसे युद्ध न करना चाहूँ तो क्या कोई और विकल्प नहीं है ? उन्होने कहा - एक विकल्प है । क्या ? यह जो तुम्हारा नाम 'राम' रखा गया है, इसे तुम छोड़ दो । आज से राम कहलाना बन्द कर दो । राम केवल मैं रहूँगा, दूसरा कोई नहीं रहेगा । इन दोनों रामों में क्या अन्तर है ? राम और परशुराम में अन्तर यह है कि श्रीराम जब राक्षसों को मारते हैं, तो उन्हें भी राम बना देते हैं । जो सारे संसार को राम बना दे वह पूर्ण है और जो यह कहे कि मुझे छोड़कर कोई दूसरा राम न रहने पाए, वह अपूर्ण है ।

No comments:

Post a Comment